बिलासपुर।प्रदेश की सभी नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को राज्य स्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है। समिति में संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ-साथ पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण से जुड़े जानकार व्यक्तियों को भी शामिल किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को निर्धारित की गई है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच में अरपा नदी सहित प्रदेश की अन्य नदियों के संरक्षण, संवर्धन एवं अवैध खनन से संबंधित ‘अरपा अर्पण महा अभियान’ द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई। कोर्ट ने कहा कि अब तक जिला स्तर पर अलग-अलग शपथपत्र प्रस्तुत किए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश की छोटी-बड़ी नदियों के संरक्षण को लेकर कोई ठोस और समन्वित कार्रवाई होती नहीं दिख रही है।
इससे पूर्व हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नदियों के संरक्षण के लिए ठोस कार्ययोजना और समयबद्ध कार्यक्रम प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। साथ ही अरपा नदी के उद्गम स्थल के आसपास स्थित निजी भूमि के अधिग्रहण एवं भू-अर्जन से संबंधित आवश्यक रिपोर्ट भी पेश करने को कहा गया था। कोरबा की लीलागर, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की सोनपन व तिपान नदियों तथा बिलासपुर की अरपा नदी के उद्गम स्थलों की सुरक्षा एवं पुनर्जीवन को लेकर भी शपथपत्र के साथ जानकारी मांगी गई थी।
सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने कहा कि इस स्थिति में एक राज्य स्तरीय समिति का गठन आवश्यक है, जो प्रदेश की सभी नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन से जुड़े कार्यों की निगरानी कर सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कार्य केवल सरकारी महकमे के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसमें समाज के जानकार और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लोगों की भागीदारी भी जरूरी है।
जब समिति में मुख्य सचिव को शामिल किए जाने का सुझाव दिया गया, तो याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद शुक्ला ने स्थानीय स्तर पर नदियों से जुड़े जानकार अधिवक्ताओं एवं विशेषज्ञों को शामिल करने का आग्रह किया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत सुझावों में अरपा नदी सहित प्रदेश की जीवनदायिनी नदियों के उद्गम स्थलों के संरक्षण और अरपा नदी में व्याप्त जल प्रदूषण को समाप्त करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई। बताया गया कि अरपा नदी का अमरपुर (पेंड्रा) स्थित उद्गम स्थल लगभग तीन दशक पूर्व तक जीवंत था, लेकिन निजी भूमि होने और शासन की उपेक्षा के कारण यह लगभग समाप्त हो गया। हाईकोर्ट के संवेदनशील निर्देशों के बाद अब 10 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर उद्गम स्थल को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इसी तरह लीलागर नदी का उद्गम स्थल जीवंत है, लेकिन समीप कृषि भूमि होने के कारण अतिक्रमण की समस्या सामने आ रही है। महानदी और सोनभद्र की उद्गम स्थली सोनकुंड (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही) में भी प्राकृतिक प्रवाह को नियंत्रित करने और प्रवाह मार्ग में खेती किए जाने से नदी के अस्तित्व पर खतरा बताया गया।हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वह राज्य स्तरीय समिति का गठन कर अगली सुनवाई में इसकी जानकारी प्रस्तुत करे।
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