प्रेस क्लब अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुके पूर्व सचिव दिलीप यादव को प्रेस क्लब ने भेजा नोटिस ,यादव ने फर्म एवं सोसाइटी के पंजीयक पर लगाए गंभीर आरोप ,कहा न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाएँगे , नोटिस से न्याय की आवाज नहीं दबेगी
मतदान के दौरान चुनाव अधिकारी का बार-बार बाहर जाना और कथित रूप से मतदान को प्रभावित करने का प्रयास, ऐसे बिंदु हैं जिनका अब तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं
आरटीआई में २००५ से लेकर २०२५ तक का मांगा गया ब्योरा
बिलासपुर छत्तीसगढ़ ।बिलासपुर प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर उपजा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। लगभग 130 सदस्यों से जुड़े मामले पर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है और मामला विचाराधीन बना हुआ है। इसी बीच प्रेस क्लब अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुके पूर्व सचिव दिलीप यादव ने फर्म एवं सोसाइटी के पंजीयक पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे पूरा चुनाव एक बार फिर संदेह के घेरे में आ गया है।
दिलीप यादव का आरोप है कि उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जबकि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर चुनाव को निरस्त कर दिया गया। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में नियम-कानूनों की अनदेखी की गई और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित किया गया।
उन्होंने चुनाव अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। यादव के अनुसार मतदान के दौरान चुनाव अधिकारी का बार-बार बाहर जाना और कथित रूप से मतदान को प्रभावित करने का प्रयास, ऐसे बिंदु हैं जिनका अब तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया है। इन गतिविधियों ने पूरे चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
पूर्व सचिव दिलीप यादव का कहना है कि वे न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं और आवश्यकता पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान सचिव की ओर से उन्हें प्रेस क्लब की छवि धूमिल करने के आरोप में नोटिस प्राप्त हुआ है, लेकिन वे इससे भयभीत नहीं हैं।
यादव का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि न्याय और पारदर्शिता के लिए है। उनके अनुसार कई पत्रकार साथी उनके साथ खड़े हैं और इस संघर्ष में उनका मनोबल बढ़ा रहे हैं।
फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस पूरे मामले में संबंधित पक्षों की ओर से क्या स्पष्टीकरण सामने आता है और क्या चुनाव से जुड़े सवालों का समाधान पारदर्शी तरीके से हो पाता है।आने वाला समय ही तय करेगा कि दिलीप यादव को न्याय मिलेगा या उनकी आवाज सत्ता के गलियारों में दबकर रह जाएगी।
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