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January 25, 2026 8:27 pm

हाई कोर्ट ने कहा- बुजुर्गों की सेवा की शर्त लिखित में न हो, फिर भी जिम्मेदारी उठाना जरूरी

बिलासपुर. बुजुर्ग दंपती की संपत्ति लेने के बाद भतीजे और बेटी ने दोनों को घर बेदखल कर दिया। बुजुर्ग दंपती ने अपना घर इस उम्मीद के साथ दिया था कि बुढ़ापे में उनका सहारा बनेगा। बेदखली के बाद बुजुर्ग दंपती ने मामला पेश किया था। एसडीओ और कलेक्टर ने दंपती के पक्ष में फैसला दिया था। इसे रामकृष्ण पांडेय ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।

बिलासपुर के कंचन विहार निवासी 83 वर्षीय सुरेशमणि तिवारी और उनकी 80 वर्षीय पत्नी लता तिवारी ने 2016 में अपने भतीजे रामकृष्ण पांडे के नाम 1250 वर्ग फीट जमीन और उस पर बने मकान की गिफ्ट डीड की थी। बुजुर्ग दंपती का कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने इस भरोसे में यह भतीजे को दी कि वह जीवन भर उनकी संपत्ति सेवा और देखभाल करेगा। बुजुर्गों का आरोप है कि संपत्ति मिलते ही भतीजे और उनकी बेटी ने उन्हें जबरन पहली मंजिल पर रहने को मजबूर किया गया, जिससे उन्हें सीढ़ियां चढ़ने में भारी तकलीफ होती थी। उनके खाने-पीने और बुनियादी जरूरतों पर रोक लगा दी। यहां तक कि बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिया गया और उनके एटीएम से करीब 30 लाख रुपए निकाल लिए।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 बुजुगों की सुरक्षा के लिए एक बहुत शक्तिशाली कानूनी प्रावधान है। यदि कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति किसी व्यक्ति को इस शर्त पर ‘गिफ्ट’ या ‘ट्रांसफर’ करता है कि वह व्यक्ति बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेगा और उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी करेगा, तो यह एक कानूनी समझौता माना जाता है। संपत्ति लेने के बाद वह व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक की देखभाल करने से इनकार कर देता है या उन्हें प्रताड़ित करता है, तो
कानून के तहत उस संपत्ति के हस्तांतरण को धोखाधड़ी, जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव से किया गया माना जाता है। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ नागरिक मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकते हैं.
हाई कोर्ट ने पाया कि गिफ्ट डीड प्यार और स्नेह के आधार पर इस उम्मीद में दी गई थी कि भविष्य में बुजुर्गों का ख्याल रखा जाएगा। जब देखभाल की शर्त का उल्लंघन हुआ और बुजुर्गों को प्रताड़ित किया गया, तो ट्रिब्यूनल का रद्द करने का फैसला बिल्कुल सही है।
हाई कोर्ट ने पाया कि गिफ्ट डीड इस उम्मीद में दी गई थी कि भविष्य में बुजुर्गों का ख्याल रखा जाएगा। जब देखभाल की शर्त का उल्लंघन हुआ तो रद्द करने का फैसला सही है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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