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November 8, 2026 5:23 pm

हिंदी पत्रकारिता की विरासत और भविष्य के सरोकारों पर मंथन के साथ राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा बोलीं-पत्रकारिता में साहित्य और चिंतन-मनन का घटता स्थान चिंतनीय

संपादक प्रकाश दुबे ने कहा-नागरिकों की खुशहाली से ही पूरा होगा विकसित भारत का संकल्प

प्रो. राम मोहन पाठक ने सम्यक और सकारात्मक पत्रकारिता को बताया भारतीय परंपरा की पहचान

Cbn36 वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष : विरासत, सरोकार और विकसित भारत का संकल्प’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का गुरुवार, 5 नवंबर को समापन हुआ। समापन समारोह में वक्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक विरासत, बदलते मीडिया परिदृश्य, सामाजिक जिम्मेदारियों और विकसित भारत के निर्माण में पत्रकारिता की भूमिका पर विचार रखे।

समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। मुख्य अतिथि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के पूर्व कुलपति प्रो. राम मोहन पाठक तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रकाश दुबे उपस्थित रहे।

अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद पत्रकारिता में तेजी से बदलाव आया है। आज पत्रकारिता में साहित्य और चिंतन-मनन से जुड़े विषयों का स्थान लगातार कम होता जा रहा है, जो चिंताजनक है। साहित्यिक संपादकों का दौर समाप्त होने के साथ अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं भी बंद हो गई हैं। वैश्विक मीडिया के प्रभाव ने पत्रकारिता को ग्राहक केंद्रित बना दिया है।

उन्होंने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने संचार का नया स्वरूप प्रस्तुत किया है, लेकिन इसके माध्यम से त्योहारों और सांस्कृतिक परंपराओं का भी व्यावसायिक दोहन हो रहा है। इससे डिजिटल साम्राज्यवाद की स्थिति निर्मित हो रही है। सोशल मीडिया ने मनोविज्ञान और वाणिज्य के बीच ऐसा संबंध बनाया है, जिसके कारण इसका नशा युवा पीढ़ी में मादक पदार्थों की लत की तरह फैल रहा है। इससे बचाव के लिए मोबाइल नशामुक्ति केंद्र तक खोलने पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुरक्षित भविष्य के लिए सांस्कृतिक परंपराओं को आधार बनाकर विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

प्रकाश दुबे ने विकसित भारत की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें नागरिकों की खुशहाली, बेहतर शिक्षा, रोजगार के पर्याप्त अवसर और व्यक्तिगत स्वाधीनता की रक्षा भी शामिल होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सरकारी विज्ञप्तियों का प्रकाशन करना नहीं है, बल्कि विकास से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाना, कमियों को सामने लाना और सरकार को रचनात्मक सुझाव देना भी पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।

मुख्य अतिथि प्रो. राम मोहन पाठक ने भारतीय पत्रकारिता की परंपरा, उसके मूल सरोकारों और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की मूल आत्मा उसके सरोकारों में निहित है। पत्रकारिता केवल घटनाओं की सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र के महत्वपूर्ण मुद्दों और जनहित के विषयों को प्राथमिकता देने वाली जिम्मेदार व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करते हुए पत्रकारिता को सम्यक, सकारात्मक, सनातन, निरंतर और नित्य नूतन बनाए रखना आवश्यक है।

समापन सत्र में स्वागत वक्तव्य प्रो. के. बालराजू ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेश लेहकपुरे ने किया। संगोष्ठी का प्रतिवेदन डॉ. रेणु सिंह ने प्रस्तुत किया तथा विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी बी.एस. मिरगे ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा ‘मीडिया समय’ का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुआ तथा समापन राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के साथ किया गया।इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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