सहस्र अकादमी में 1 नवंबर को विशेष कार्यशाला, देशभर में प्रचलित प्रणाली के सरलीकरण और नई तकनीकों पर होगी चर्चा
Cbn36 बिलासपुर। हिन्दी आशुलिपि (हिन्दी स्टेनोग्राफी) की प्रशिक्षण पद्धति को अधिक सरल, प्रभावी और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से 1 नवंबर 2026 को बिलासपुर के उसलापुर स्थित सहस्र अकादमी में विशेष कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। कार्यशाला सुबह 10:30 बजे प्रारंभ होगी। इसमें दुर्ग के श्री जगमोहन सिन्हा प्रमुख वक्ता तथा रायपुर के श्री राजेश पांडेय विशेष वक्ता के रूप में शामिल होंगे।
कार्यशाला में हिन्दी आशुलिपि के नवीन पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण पद्धति, अध्यापन शैली और प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाएगी। इसके साथ ही एनएसक्यूएफ के अंतर्गत नवीन पाठ्यक्रम, एक कुशल प्रशिक्षक के दायित्व तथा हिन्दी आशुलिपि के सैद्धांतिक, व्यावहारिक एवं प्रायोगिक पहलुओं पर भी विचार-विमर्श होगा। प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षकों को आने वाली समस्याओं और उनके समाधान पर भी चर्चा की जाएगी।
88 वर्ष पुरानी प्रणाली को समय के अनुरूप बनाने की पहल
हिन्दी आशुलिपि के क्षेत्र में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए श्री जे.एम. सिन्हा ने कहा कि स्टेनोग्राफी अर्थात हिन्दी आशुलिपि एक चमत्कारिक एवं रोजगारपरक विद्या है। वर्ष 1938 में विकसित ऋषि प्रणाली लंबे समय से देशभर में प्रचलित, लोकप्रिय और व्यापक रूप से स्वीकार्य रही है। हालांकि, बीते 88 वर्षों में इसमें अपेक्षित बदलाव नहीं हो पाए हैं।
उन्होंने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इसी सोच के साथ ऋषि प्रणाली को आधार बनाकर हिन्दी आशुलिपि को अधिक सरल, सहज और परिष्कृत स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। इसी उद्देश्य से नवीन हिन्दी प्रणाली पुस्तक का प्रकाशन भी किया गया है, ताकि प्रशिक्षण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सके और विद्यार्थियों के लिए इस विद्या को सीखना आसान हो।
संभागभर के प्रशिक्षकों की रहेगी सहभागिता
इस विशेष कार्यशाला में बिलासपुर, मुंगेली, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, भिलाई, कोरबा, रायगढ़, घरघोड़ा, सारंगढ़, पामगढ़, जांजगीर-चांपा एवं कोटा आईटीआई सहित विभिन्न क्षेत्रों के हिन्दी आशुलिपि प्रशिक्षकों के शामिल होने की संभावना है।
आयोजकों के अनुसार, कार्यशाला का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण की मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा करना ही नहीं, बल्कि हिन्दी आशुलिपि की शिक्षण प्रणाली को अधिक सरल, व्यावहारिक और समयानुकूल बनाने के लिए उपयोगी सुझावों पर विचार करना भी है। इस पहल से हिन्दी आशुलिपि के प्रशिक्षकों को अपने अनुभव साझा करने और प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार के नए रास्ते तलाशने का अवसर मिलेगा।
प्रधान संपादक