“जेल से रिहाई के समय रील बनाने वाले दो युवकों पर सिविल लाइन पुलिस की कार्रवाई, थार वाहन जब्त; माफी मांगकर दोबारा गलती नहीं करने का दिया भरोसा”
Cbn36 बिलासपुर। सोशल मीडिया पर चंद लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स बटोरने का जुनून कुछ लोगों पर इस कदर हावी है कि वे मौके की संवेदनशीलता और कानून की मर्यादा तक भूल जाते हैं। जेल से रिहाई जैसे गंभीर अवसर को भी रील बनाने का मौका समझने वालों पर अब बिलासपुर पुलिस ने सख्त रुख अपनाया है। एसएसपी रजनेश सिंह की नाराजगी और निर्देश के बाद सिविल लाइन पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने मामले में इस्तेमाल थार वाहन भी जब्त किया है। दोनों आरोपियों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी मांगी और भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं करने का भरोसा दिया।
लेकिन इस कार्रवाई के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है जब पुलिस लगातार रील बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, तो आखिर कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज क्यों नहीं आ रहे हैं?
एसएसपी की सख्ती, कानून से खिलवाड़ करने वालों को स्पष्ट संदेश
बिलासपुर में सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में नियमों और सार्वजनिक मर्यादा की अनदेखी करने वालों के खिलाफ पुलिस का रुख सख्त होता दिखाई दे रहा है। एसएसपी रजनेश सिंह ने जेल से रिहाई के समय रील बनाने के मामले में नाराजगी जताते हुए कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद सिविल लाइन थाना पुलिस ने दोनों युवकों के खिलाफ कार्रवाई की।
पुलिस ने सक्षम ध्रुव, पिता सतीश ध्रुव, निवासी कटियापारा, थाना कोतवाली और साहिल केवट, पिता जीवन केवट, निवासी दयालबंद, थाना कोतवाली को गिरफ्तार किया। दोनों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170 के तहत कार्रवाई की गई। साथ ही घटना में इस्तेमाल थार वाहन जब्त किया गया।
पुलिस की इस कार्रवाई का संदेश स्पष्ट है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के लिए कानून और व्यवस्था की अनदेखी करना उचित नहीं है। हालांकि, किसी भी मामले में कानूनी कार्रवाई का आधार संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों से तय होता है।
आखिर क्यों नहीं बाज आ रहे रील बनाने वाले?
आज सोशल मीडिया पर वायरल होने की चाह ने रील बनाने की प्रवृत्ति को एक अलग ही दिशा दे दी है। कुछ सेकंड की वीडियो के जरिए पहचान बनाने की कोशिश में कुछ लोग ऐसे दृश्य तैयार करने लगते हैं, जिनसे दूसरों का ध्यान आकर्षित हो। इस होड़ में सार्वजनिक मर्यादा, नियमों और परिस्थितियों की गंभीरता को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति चिंता का विषय बन रही है।
सवाल यह है कि पुलिस की कार्रवाई के बावजूद ऐसी घटनाएं क्यों सामने आती हैं? क्या सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक और कमेंट कानूनी कार्रवाई के डर पर भारी पड़ रहे हैं? क्या कुछ लोगों को लगता है कि वीडियो वायरल हो जाने के बाद उन्हें मिलने वाली प्रसिद्धि ही सबसे बड़ी उपलब्धि है?
जेल से रिहाई का अवसर कोई मनोरंजन का मंच नहीं है। ऐसे संवेदनशील मौके पर रील बनाने की कोशिश समाज में जिम्मेदार व्यवहार और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
माफी मांगना आसान, लेकिन गलती से सबक लेना जरूरी
इस मामले में दोनों आरोपियों ने माफी मांगते हुए दोबारा ऐसी गलती नहीं करने का भरोसा दिया है। लेकिन किसी गलती के लिए माफी मांगना और वास्तव में अपने व्यवहार में बदलाव लाना दो अलग-अलग बातें हैं।
पुलिस की कार्रवाई का उद्देश्य केवल संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कदम उठाना ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों तक यह संदेश पहुंचाना भी है कि सोशल मीडिया के नाम पर मनमानी करना उचित नहीं है। लोकप्रियता की चाह में उठाया गया गैर-जिम्मेदाराना कदम कानूनी परेशानी का कारण बन सकता है।
रील बनाना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उसके लिए अपनाया गया तरीका यदि कानून का उल्लंघन करता है या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है, तो कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
एसएसपी की सख्ती के बाद अब किसकी बारी?

एसएसपी रजनेश सिंह के निर्देश पर सिविल लाइन पुलिस की यह कार्रवाई सोशल मीडिया पर रील बनाने के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों के लिए एक चेतावनी है। लगातार कार्रवाई के बावजूद यदि ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल पुलिस व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और डिजिटल व्यवहार से भी जुड़ा विषय है।
आखिर कुछ सेकंड की रील के लिए कानून और मर्यादा को दांव पर लगाने की जरूरत ही क्या है? सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि क्षणिक हो सकती है, लेकिन गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के परिणाम लंबे समय तक परेशान कर सकते हैं।
अब देखना यह है कि एसएसपी की सख्ती और पुलिस की कार्रवाई से ऐसे लोग सबक लेते हैं या फिर वायरल होने की होड़ में दोबारा वही गलती दोहराते हैं। फिलहाल, बिलासपुर पुलिस की कार्रवाई ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता की चाह कानून और सार्वजनिक मर्यादा से ऊपर नहीं हो सकती।
प्रधान संपादक