
स्व-सहायता समूह से मिला सहारा, बचत और ऋण से संवरे आजीविका के रास्ते; कल्पना बनीं किसान तो मति बाई ने शुरू किया मुर्गी पालन
CBN36 रायपुर, 21 सितंबर। कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली ग्रामीण महिलाएं अब खेत से बाजार और मजदूरी से कारोबार तक का सफर तय कर रही हैं। मेहनत, हुनर और अवसर के सहारे महिलाएं न केवल परिवार की आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि आर्थिक फैसलों में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़े स्व-सहायता समूहों ने महिलाओं को बचत, ऋण, प्रशिक्षण और आजीविका गतिविधियों से जोड़कर आत्मनिर्भरता की राह दिखाई है। इसी बदलाव की तस्वीर ‘लखपति दीदी’ की कहानियों में दिखाई दे रही है।
छोटी बचत बनी बड़े बदलाव की वजह
बिहान से जुड़े स्व-सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं को एकजुट होकर नियमित बचत करने का अवसर दिया। समूह की सामूहिक शक्ति से जरूरत के समय ऋण मिलने लगा और महिलाओं ने अपनी क्षमता व स्थानीय संसाधनों के अनुसार आजीविका के साधन चुने। किसी ने खेती और सब्जी उत्पादन शुरू किया तो किसी ने पशुपालन व मुर्गी पालन को व्यवसाय बनाया।
इससे महिलाओं की आय बढ़ने के साथ उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा। अब वे बैंकिंग, बाजार और ऋण संबंधी प्रक्रियाओं को समझते हुए आर्थिक गतिविधियों में खुद निर्णय ले रही हैं।
डेढ़ लाख के ऋण से खीरे की खेती, अब कई फसलों से बढ़ी आमदनी
अम्बिकापुर विकासखंड की कल्पना सिंह ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर कृषि को अपनी आजीविका का आधार बनाया। उन्होंने कृषि कार्य के लिए डेढ़ लाख रुपये का ऋण लेकर खीरे की खेती शुरू की। इसके बाद उन्होंने बैंगन, टमाटर, तरबूज समेत मौसम के अनुसार अन्य सब्जियों और फसलों का उत्पादन भी शुरू किया।
कल्पना का कहना है कि खेती से जुड़ने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। पहले घर से बाहर निकलने और लोगों से बातचीत करने में संकोच होता था, लेकिन अब वह बैंकिंग से लेकर बाजार तक के काम खुद संभाल रही हैं। खेत से बाजार तक का यह सफर उनके लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ सामाजिक आत्मविश्वास की भी नई शुरुआत बना है।
तीन लाख के ऋण से शुरू किया मुर्गी पालन
उदयपुर विकासखंड के ग्राम सोनतरई की मति बाई के परिवार की आर्थिक स्थिति कभी मजदूरी और छोटे-मोटे कामों पर निर्भर थी। उन्होंने राधा स्व-सहायता समूह से जुड़कर आर्थिक स्थिति बदलने का प्रयास किया। समूह के माध्यम से तीन लाख रुपये का ऋण लेकर उन्होंने मुर्गी पालन शुरू किया।
लगातार मेहनत से उनका व्यवसाय आगे बढ़ा और आज मुर्गी पालन उनकी आय का महत्वपूर्ण जरिया बन चुका है। मति बाई के अनुसार उन्हें इससे सालाना करीब दो से तीन लाख रुपये की शुद्ध आय हो रही है। उनके बच्चे भी काम में सहयोग करते हैं। आय बढ़ने से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और बच्चों की पढ़ाई व भविष्य को लेकर भी उम्मीद बढ़ी है।
‘लखपति दीदी’ बनना सिर्फ कमाई नहीं, आत्मविश्वास की पहचान
महिलाओं के लिए ‘लखपति दीदी’ बनना केवल एक आर्थिक उपलब्धि नहीं है। यह निर्भरता से आत्मनिर्भरता और संकोच से आत्मविश्वास तक पहुंचने की यात्रा भी है। आय अर्जित करने वाली महिलाएं अब परिवार के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की बचत में योगदान दे रही हैं।
बैंक जाना, ऋण लेना, बाजार में उत्पाद बेचना और अपनी कमाई के उपयोग को लेकर निर्णय लेना अब उनके जीवन का हिस्सा बन रहा है।
गांवों में आजीविका के नए विकल्प
बिहान के स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को कृषि, सब्जी उत्पादन, पशुपालन, मुर्गी पालन, दुग्ध व्यवसाय, सिलाई सहित कई गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। प्रशिक्षण और समूह का सहयोग महिलाओं को अपने काम को आगे बढ़ाने में मदद कर रहा है।
समूह की बैठकों में महिलाएं एक-दूसरे के अनुभव साझा करती हैं। इससे उन्हें नई जानकारी के साथ अपने काम में आने वाली चुनौतियों का समाधान खोजने का अवसर मिलता है।
एक महिला की बढ़ी आमदनी से मजबूत होता है पूरा परिवार
महिला की आय बढ़ने का असर केवल उसके व्यक्तिगत जीवन पर नहीं पड़ता। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। बच्चों की शिक्षा, घरेलू जरूरतों और भविष्य की योजनाओं को पूरा करने में अतिरिक्त सहारा मिलता है।
यही वजह है कि महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को परिवार की मजबूती से जोड़कर देखा जा रहा है। कल्पना सिंह और मति बाई जैसी महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि सही अवसर, समूह का सहयोग और निरंतर मेहनत मिल जाए तो ग्रामीण महिला अपने परिवार की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है।
सेवा संकल्प की कहानियों में दिख रहा बदलाव
सेवा संकल्प अभियान के तहत सामने आ रही इन कहानियों में योजनाओं के लाभ से आगे बढ़कर बदलाव की वास्तविक तस्वीर दिखाई दे रही है। बिहान ने महिलाओं को केवल आजीविका का साधन नहीं दिया, बल्कि संगठित होने, सीखने, निर्णय लेने और अपने भविष्य की दिशा तय करने का आत्मविश्वास भी दिया है।
आज ग्रामीण महिलाएं परिवार की खुशहाली में सहभागी होने के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। ‘लखपति दीदी’ की पहचान इसी बदलती तस्वीर का प्रतीक बन रही है।
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