यूथ कांग्रेस चुनाव, पत्ता साफ होते-होते बचे उम्मीदवार
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में फ्रंटल आर्गेनाइजेश माने वाले यूथ कांग्रेस संगठनात्मक चुनाव का जोर चल रहा है। पूर्व सीएम और एक एमएलए के बीच गुटीय लड़ाई इस कदर हावी हो गई है, बात दिल्ली तक जा पहुंची, कमेटी बैठ गई, तब यह चर्चा शुरू हो गई थी, दोनों गुट के उम्मीदवार का पत्ता साफ ना हो जाए। डमी की ओर नजरें भी टिक गई थी। डमी की बल्ले-बल्ले होने ही वाली थी, कमेटी ने ओके कर दिया। अब रास्ता साफ हो गया है, दोनों गुट के बड़े चेहरे ही मैदान में रहेंगे और दिग्गजों के इशारे पर शह और मात का खेल खेलेंगे। देखने वाली बात ये है, गुरु गुड़ ही रह जाएंगे या फिर चेला शक्कर बन जाएगा। गुरु चेले के बीच के सियासी झगड़े में मोहरों की कमी नहीं है। जहां तक आपकी नजरें जा रही है, मोहरे ही मोहरे नजर आ रहे होंगे। चुनावी जंग जीतने का तरीका भी तो यही है। मोहरों की सधी चाल ही चुनावी वैतरणी पार कराएगगी।
प्रशिक्षण शिविर में दिग्गजों की मौजूदगी और कानाफूसी
बात कांग्रेस की सियासत की चल पड़ी है तो इसे थोड़ा और आगे बढ़ा लेते हैं। ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों व पदाधिकारियों का तीन दिनी प्रशिक्षण शिविर का आगाज बिलासपुर के मोपका में हो गया है। प्रशिक्षण का पहला दिन दिग्गजों के नाम रहा। संगठन को मजबूती देने से लेकर और भी बातें हुई। इन बातों में यूथ कांग्रेस चुनाव की चर्चा भी छिड़ने की बातें आ रही है। नेता प्रतिपक्ष से लेकर पूर्व सीएम और पीसीसी चीफ के बीच किन बातों पर चर्चा हुई, इस पर दोनों गुट के दिग्गजों से लेकर सिपहसालारों की नजरें तो लगी रही, दोनों कान को ज्यादा लगाया। नजरों ने क्या देखा और कानों ने क्या सुना, ये तो वे लोग ही जाने,जो बातें छनकर आ रही है,उसमें तो दाऊजी की ही जय होने की बात कही जा रही है। आगे-आगे देखते जाइए होता है क्या?
गरमाने लगी है अरपा पार की राजनीति, चुनाव आते क्या होगा राम जाने
अरपा पार सरकंडा की सियासत अब गरमाने लगी है। तासिर भी कुछ इसी अंदाज में दिखाई दी। अरपा पार सरकंडा को नगर निगम का दर्जा देने को लेकर बीते दिनों जो कुछ हुआ, हम सबने देखा। पंडाल में कांग्रेसी नेताओं से लेकर अरपापार के निवासी नजर आ रहे थे। यही कारण है, आमरण अनशन में बैठे नेताजी की ना तो जिला प्रशासन ने सुध ली और ना ही सत्ता से जुड़े लोगों ने। इसे डर कहें या फिर दूरी। जो भी सोचें या जो कह लें। मतलब तो एक ही है। सिपहसालारों को लगा होगा, आंदोलन स्थल पर जाने और आमरण अनशनकारी से चर्चा करने से क्रेडिट टेंट में बैठे नेताओं को ही मिल जाएगा, सो दूरी बनाकर रखना ही भला समझा। सत्ताधारी दल के नेताओं की सियासी मजबूरी तो समझ में आती है, अफसरों के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी रह गई, अनशनकारी की तबियत बिगड़ने के बाद भी सुध नहीं ली।
पीएम का बर्थडे और व्यस्तता ऐसी कि पूछो मत
प्रधानमंत्री का जन्मदिन आने वाला है। भाजपा ने इसे सेवा सप्ताह के रूप में मनाने का निर्णय ले लिया है। सप्ताह को छोड़िए पूरे एक महीने तक अलग-अलग कार्यक्रम होंगे। सत्ताधारी दल के अलावा प्रशासन भी अपने स्तर पर इसे सेलिब्रेट करने का निर्णय लिया है। केंद्र सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए काम होते नजर आएंगे। प्रशासनिक अमला पूरी तरह मैदान में भी दिखाई देंगे। इस बीच छोटे-मोटे काम झटके में निपट जाएगा। तभी तो लोगों को अहसास होगा, यह सब किसलिए और किस मकसद से किया जा रहा है। पब्लिक को अपनी सरकार और अपना प्रशासन का अहसास कराने के लिए तो ही मशक्कत करते नजर आएंगे। जाहिर है इसका इनपुट भी मिलेगा। पार्टी को भी और प्रशासनिक अमले को भी।
अटकलबाजी
अरपा पार सरकंडा को नगर निगम का दर्जा देने कांग्रेस नेता अमित तिवारी आमरण अनशन पर बैठे, प्रशासनिक अमले ने क्यों दूरी बनाई, कोटा विधायक को क्यों जाना पड़ा?
यूथ कांग्रेस चुनाव में किस खेमे की जीत होगी। दाऊजी का खेमा जीता तो किसकी बल्ले-बल्ले होगी, कौन-कौन हाशिए पर जाएंगे?
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