Explore

Search

August 16, 2026 11:54 pm

महाराष्ट्र के वर्धा में मिला भारत का पहला ‘ल्यूसिस्टिक’ लालपंखी चंडोल, बोर की जैवविविधता में जुड़ा नया रिकॉर्ड

7 अगस्त को येणीदोडका में वन्यजीव अध्येता मनेशकुमार सज्जन ने की दुर्लभ पक्षी की रिकॉर्डिंग

CBN36 वर्धा। महाराष्ट्र के वर्धा जिले में भारतीय पक्षी विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सामने आया है। बोर व्याघ्र प्रकल्प के पास मौजे येणीदोडका, तहसील कारंजा (घा.) में लालपंखी चंडोल (Indian Bushlark) में ल्यूसिज्म यानी शरीर के पंखों का असामान्य रूप से सफेद होना दर्ज किया गया है। दावा किया जा रहा है कि भारत में इस प्रजाति में ल्यूसिस्टिक प्लमेज की यह पहली रिकॉर्डिंग है।

यह दुर्लभ पक्षी 7 अगस्त 2026 को वन्यजीव अध्येता एवं वनरक्षक, वन अनुसंधान केंद्र वर्धा, मनेशकुमार सज्जन को नियमित पक्षी निरीक्षण के दौरान दिखाई दिया। उन्होंने पक्षी की फोटोग्राफी, वीडियो और ध्वनि रिकॉर्डिंग की।

आंखें सामान्य, शरीर के कई हिस्से सफेद

निरीक्षण के दौरान पक्षी के सिर, माथे, चेहरे, गले, गर्दन, छाती, कंधे के कुछ हिस्से और पीठ के पंख सफेद दिखाई दिए। वहीं पंखों, पूंछ और शरीर के अन्य हिस्सों में लालपंखी चंडोल का मूल भूरा रंग और धारियां बनी हुई थीं। इसके पैर हल्के गुलाबी और चोंच का कुछ हिस्सा भी गुलाबी दिखाई दिया।

विशेषज्ञों के मुताबिक, पक्षी की आंखें गहरे रंग की होने के कारण इसे पूर्ण एल्बिनो नहीं माना जा सकता। आंखों का सामान्य रंग और शरीर के पंखों में रंग की कमी इसे ल्यूसिस्टिक पक्षी की श्रेणी में रखती है।

क्या होता है ल्यूसिज्म?

ल्यूसिज्म पक्षियों में पाया जाने वाला एक दुर्लभ रंग परिवर्तन है, जो मेलेनिन के निर्माण या उसके शरीर में वितरण से जुड़े आनुवंशिक बदलाव के कारण हो सकता है। इसमें कुछ पंख आंशिक या पूरी तरह सफेद हो जाते हैं। एल्बिनिज्म के विपरीत ल्यूसिज्म में आंखों का रंग सामान्य रह सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी रिकॉर्डिंग पक्षियों में आनुवंशिक विविधता, विकास और पर्यावरणीय प्रभावों के अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण होती हैं।

सूखे और खुले इलाकों में मिलता है लालपंखी चंडोल

लालपंखी चंडोल का वैज्ञानिक नाम Mirafra erythroptera है। यह मध्यम आकार का पक्षी है, जो मुख्य रूप से शुष्क और खुले क्षेत्रों में पाया जाता है। भारत के विभिन्न हिस्सों के अलावा महाराष्ट्र में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है।

यह बंजर भूमि, घास के मैदान, झाड़ीदार क्षेत्र, पथरीले खुले इलाकों और कृषि क्षेत्रों के आसपास देखा जाता है। इसकी लंबाई करीब 13.5 से 15 सेंटीमीटर होती है। शरीर का रंग सामान्यतः भूरा और ऊपरी हिस्से पर गहरी धारियां होती हैं। पंखों में लाल या तांबे जैसी छटा दिखाई देने के कारण इसे Red-winged Bushlark भी कहा जाता है।

जमीन पर भोजन तलाशता है, उड़ान के दौरान निकालता है मधुर आवाज

लालपंखी चंडोल को अक्सर जमीन पर चलते हुए या भोजन तलाशते हुए देखा जाता है। इसके भोजन में बीज और छोटे अकशेरुकी जीव शामिल होते हैं। प्रजनन काल में यह उड़ान भरते हुए मधुर सीटियां, ट्रिल्स और विभिन्न प्रकार की आवाजें निकालता है।

‘भारत में पहली रिकॉर्डिंग होने का प्रारंभिक निष्कर्ष’

मनेशकुमार सज्जन ने बताया कि नियमित पक्षी निरीक्षण के दौरान पक्षी पहली नजर में ही सामान्य से अलग लगा। बारीकी से निरीक्षण के बाद फोटो, वीडियो और ध्वनि रिकॉर्डिंग की गई। आंखों का सामान्य रंग और शरीर पर सफेद पंखों के आधार पर इसे ल्यूसिस्टिक माना गया है।

उन्होंने कहा कि इंडियन बुशलार्क में भारत में इस तरह के रंग परिवर्तन की यह पहली रिकॉर्डिंग होने का प्रारंभिक निष्कर्ष है। इस संबंध में वैज्ञानिक शोध लेख प्रकाशित करने की योजना भी है।

विशेषज्ञ बोले- वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण जरूरी

वन्यजीव अध्येता एवं पक्षी विशेषज्ञ राजू कसंबे के अनुसार, ल्यूसिज्म आनुवंशिक बदलाव से जुड़ा दुर्लभ रंग परिवर्तन है। इसमें कुछ पंख सफेद या हल्के रंग के हो सकते हैं, जबकि आंखों का रंग सामान्य रहता है। कुछ मामलों में चोंच और पैरों के रंग में भी बदलाव दिखाई दे सकता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे प्रत्येक दुर्लभ पक्षी का फोटो सहित वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण भविष्य के शोध के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

वर्धा में लगातार दिख रहे दुर्लभ रंग वाले पक्षी

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के मानवशास्त्री एवं वन्यजीव प्रेमी डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव ने कहा कि वर्धा में लगातार ल्यूसिस्टिक और एल्बिनो पक्षियों का दिखाई देना अध्ययन का विषय है। उनके अनुसार, पक्षियों में हो रहे ऐसे आनुवंशिक बदलावों के कारणों को समझने के लिए तत्काल शोध की जरूरत है।

सज्जन पहले भी कर चुके हैं दुर्लभ रिकॉर्डिंग

मनेशकुमार सज्जन इससे पहले भी दुर्लभ रंग परिवर्तन वाले वन्यजीवों की रिकॉर्डिंग कर चुके हैं। इनमें श्री सज्जन और दर्शन दुधाने द्वारा रिकॉर्ड किया गया पूर्ण एल्बिनो छोटा कंठेरी चिखल्या (Little Ringed Plover), डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव के साथ रिकॉर्ड किया गया आंशिक एल्बिनो लालबुड्या बुलबुल (Red-vented Bulbul) और बोर व्याघ्र प्रकल्प में दर्ज किया गया ल्यूसिस्टिक भालू शामिल है।इन रिकॉर्डिंग्स से महाराष्ट्र में वन्यजीवों में होने वाले दुर्लभ रंग परिवर्तनों के अध्ययन को महत्वपूर्ण आधार मिलने की बात कही जा रही है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

Advertisement Carousel
CRIME NEWS

BILASPUR NEWS