CBN36 मुंबई। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र, मुंबई विश्वविद्यालय और डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में 14 अगस्त को मुंबई विश्वविद्यालय के नेशनल सेंटर फॉर नैनो साइंस एंड नैनो टेक्नोलॉजी ऑडिटोरियम में ‘डॉ. अंबेडकर और कृषि में उनका योगदान’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।
संगोष्ठी की अध्यक्षता मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रवींद्र डी. कुलकर्णी ने की। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के समाज कार्य संस्थान के निदेशक प्रो. के. बालराजु मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में मुंबई विश्वविद्यालय के डॉ. अंबेडकर पीठ के निदेशक प्रो. वाल्मीकि के. सरवाड़े ने अतिथियों का स्वागत करते हुए स्वागत भाषण दिया।
किसानों के हित में अंबेडकर के योगदान को किया याद
मुख्य अतिथि प्रो. के. बालराजु ने उद्घाटन भाषण में कहा कि भारत रत्न डॉ. बी.आर. अंबेडकर ब्रिटिश भारत के पहले ऐसे विधायक थे, जिन्होंने मध्यस्थ जमींदारी प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने के लिए ऐतिहासिक विधेयक पेश किया था। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने किसानों और राज्य के बीच सीधे कर संबंध स्थापित करने तथा बिचौलियों के पूर्ण उन्मूलन के लिए लगातार संघर्ष किया।
प्रो. बालराजु ने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने ग्रामीण भारत में अतिरिक्त कृषि कार्यबल की समस्या के समाधान के लिए राज्य के नेतृत्व में औद्योगीकरण का ठोस सुझाव दिया था। उनके विचार कृषि व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण रहे हैं।
कृषि नीतियों पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
संगोष्ठी में प्रसिद्ध विद्वान प्रो. आशीषकुमार जनक राय दवे ने मुख्य भाषण दिया। वहीं महाराष्ट्र कृषि मूल्य आयोग के सदस्य प्रो. परशराम पाटिल ने कृषि नीतियों से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।
देशभर से पहुंचे शोधार्थी
राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से आए शोधार्थियों, शिक्षाविदों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतिभागियों ने डॉ. अंबेडकर के कृषि संबंधी विचारों और योगदान से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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