बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में कड़ी सुरक्षा के बीच कोर्ट में पेश हुए दोनों नाबालिग, 2 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो नाबालिग बच्चों से जुड़े बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) प्रकरण की सुनवाई में स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में बच्चों की इच्छा, मानसिक स्थिति और उनका सर्वोत्तम हित ही सर्वोपरि है। इसी उद्देश्य से अदालत ने दोनों बच्चों की स्वतंत्र काउंसलिंग कराने का निर्देश देते हुए रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ के समक्ष मंगलवार को दोनों नाबालिगों को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पेश किया गया। इससे पहले सोमवार को हुई सुनवाई में अदालत ने दोनों बच्चों को पेश करने के साथ अंबिकापुर और कोरिया के जिला दंडाधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
सुनवाई के दौरान कोरिया की कलेक्टर रोक्तिमा यादव, सरगुजा के अपर जिला दंडाधिकारी राम सिंह ठाकुर, महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी तथा संबंधित चाइल्ड केयर संस्थानों के प्रतिनिधि भी अदालत में उपस्थित रहे।
खंडपीठ ने कहा कि मामले में आगे की सुनवाई से पहले बच्चों से बाल-अनुकूल वातावरण में अलग से बातचीत आवश्यक है, ताकि उनकी वास्तविक इच्छा, मानसिक स्थिति और सर्वोत्तम हितों का निष्पक्ष आकलन किया जा सके। इसके लिए अदालत ने छत्तीसगढ़ स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी की निदेशक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता नौशिना आफरीन अली को दोनों बच्चों की काउंसलिंग करने का दायित्व सौंपा। न्यायालय ने काउंसलिंग रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि अगली सुनवाई निकट होने के कारण बच्चों को उसी दिन उनके मूल चाइल्ड केयर संस्थानों में वापस भेजना व्यावहारिक नहीं होगा। इसलिए बिलासपुर जिला प्रशासन को उनके सुरक्षित और आरामदायक ठहरने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही आदेश दिया गया कि अगले दिन उन्हें संबंधित चाइल्ड केयर संस्थानों में वापस भेजा जाए।
खंडपीठ ने अगली सुनवाई तक दोनों नाबालिगों और उपस्थित प्रशासनिक अधिकारियों को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट भी प्रदान कर दी है। मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को होगी।
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