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January 25, 2026 3:01 pm

रायपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली: व्यवस्था, चुनौतियाँ और सरकार की परीक्षा

सरकार को यह तय करना होगा कि प्राथमिकता अपराध पर नियंत्रण है या फिर प्रशासनिक शक्तियों का समायोजन

राजधानी रायपुर का शहरी विस्तार जिस तेज़ी से हो रहा है, उसी अनुपात में अपराध की चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं। ऐसे में राज्य की विष्णु सरकार द्वारा पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का निर्णय कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह न केवल सराहनीय पहल है, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का मूल दायित्व भी है।

हालांकि, पुलिस कमिश्नर प्रणाली के लागू होने से पहले ही अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक शक्तियों को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। किसी भी नई व्यवस्था के साथ असमंजस और विमर्श स्वाभाविक है, क्योंकि इन्हीं सवालों के माध्यम से व्यवस्था को बेहतर बनाने का मार्ग प्रशस्त होता है। माना जा रहा है कि सरकार इन सामने आ रही कमियों पर गंभीर मंथन कर रही होगी।

इसी बीच यह तथ्य भी सामने आया है कि प्रणाली के प्रारूप को लेकर आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के बीच अधिकारों के संतुलन को लेकर मतभेद उभरे हैं। प्रशासनिक हलकों में इसे एक तरह की आंतरिक खींचतान के रूप में देखा जा रहा है, जिसका असर पुलिस कमिश्नर प्रणाली के ड्राफ्ट पर भी पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकारों की यह प्रतिस्पर्धा नई नहीं है लेकिन इसका असर व्यवस्था की मजबूती पर नहीं पड़ना चाहिए।

अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी राज्य सरकार की है कि वह इन आंतरिक मतभेदों को दूर कर बड़े महानगरों की तर्ज पर रायपुर में एक सशक्त और प्रभावी पुलिस तंत्र विकसित करे। क्षेत्राधिकार और शक्तियों से जुड़े विवादों का समाधान क्रमबद्ध ढंग से किया जाना आवश्यक है, ताकि व्यवस्था अपने उद्देश्य से भटके नहीं।

गौर तलब है कि रायपुर के पहले पुलिस कमिश्नर के रूप में अनुभवी और संतुलित छवि वाले आईपीएस अधिकारी डॉ संजीव शुक्ला को जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रशासनिक अनुभव और कार्यशैली को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि उनके नेतृत्व में रायपुर पुलिस जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी और कानून-व्यवस्था को नई दिशा मिलेगी।

आईपीएस डॉ संजीव शुक्ला की नियुक्ति से उम्मीद की एक किरण ज़रूर दिखती है। उनकी छवि एक सुलझे हुए और निर्णय लेने वाले अधिकारी की रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें वही अधिकार मिलेंगे जिनके दम पर यह प्रणाली वास्तव में असर दिखा सके। वरना यह व्यवस्था भी फाइलों में ही सफल और सड़कों पर विफल होकर रह जाएगी।

यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार अपराध नियंत्रण की मंशा से ज़्यादा अफसरशाही के संतुलन में उलझ गई है। अधिकारों की यह जंग अगर इसी तरह जारी रही, तो पुलिस कमिश्नर प्रणाली केवल एक नाम भर बनकर रह जाएगी और जनता की अपेक्षाएं फिर अधूरी रह जाएंगी।

अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है। सरकार को यह तय करना होगा कि प्राथमिकता अपराध पर नियंत्रण है या फिर प्रशासनिक शक्तियों का समायोजन। क्षेत्र और अधिकार को लेकर जो भ्रम की स्थिति बनी है, उसे सख्ती और स्पष्टता के साथ दूर करना होगा।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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