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January 12, 2026 1:33 am

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी’ पर हुआ विमर्श

दुनिया के 150 से अधिक देशों में हिंदी का अध्ययन हो रहा है : प्रो. आनंद वर्धन शर्मा

वर्धा।उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में वर्धा में आयोजित त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत ग़ालिब सभागार में वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी विषय पर विचार-विमर्श किया गया। सत्र की अध्यक्षता काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. शर्मा ने कहा कि तकनीक ने हिंदी के वैश्विक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज यह जानना आवश्यक हो गया है कि हिंदी साहित्य का विश्व की किन-किन भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उन्होंने कहा कि अनेक विद्वानों का मत है कि भारत की राष्ट्रीय भाषा हिंदी ही होनी चाहिए और इसके प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। वर्तमान में 150 से अधिक देशों में हिंदी का अध्ययन हो रहा है और भारत से अनेक शिक्षक विदेशों में हिंदी शिक्षण कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक साहित्य तक हिंदी रचनाओं के अनुवाद से हिंदी का वैश्विक स्वरूप सुदृढ़ हुआ है। विश्व के अनेक देशों में आयोजित भारतीय बाज़ार और उत्सव हिंदी के प्रचार के प्रभावी माध्यम बन रहे हैं। मनोरंजन के साधनों को भी अब अकादमिक अध्ययन का विषय बनाया जा रहा है। सत्यम दास के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी छोटे से छोटे देश में भी एक सक्षम भाषा के रूप में स्थापित है। बड़ी संख्या में विदेशी विद्यार्थी भारत आकर हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं।

मुख्य अतिथि के रूप में जापान के वासेदा विश्वविद्यालय से प्रो. हितओआकि ईशिदा ने भारत–जापान संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंध अत्यंत प्राचीन हैं, जिनकी शुरुआत छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म के माध्यम से हुई। उन्होंने बताया कि जापान में हिंदू देवी-देवताओं का सांस्कृतिक प्रभाव आज भी देखने को मिलता है। उन्होंने तंजिको तोकोबे की कथाओं, जमशेदजी टाटा के जापान आगमन और व्यापारिक संबंधों का उल्लेख किया। प्रो. ईशिदा ने बताया कि 1888 में जापान में विदेशी भाषा स्कूल तथा 1908 में हिंदुस्तानी भाषा विभाग की स्थापना हुई। टोक्यो और ओसाका हिंदी शिक्षण के प्रमुख केंद्र हैं, जहाँ प्रतिवर्ष 150 से 200 विद्यार्थी हिंदी सीखते हैं।

सारस्वत अतिथि डॉ. इंदिरा गाजियावा रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी फॉर द ह्यूमैनिटीज, मॉस्को ने कहा कि रूस में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। उनके विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम में अनिवार्य गद्य को शामिल किया गया है।

बेल्जियम से जुड़े रो देबावेये पूर्व विदेशी विद्यार्थी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) ने हिंदी साहित्य के वैश्विक महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं फ्रांस से डॉ. निकोला बुआँ मैंसीपातो ने कहा कि हिंदी एक समृद्ध सांस्कृतिक खजाना है और केवल अंग्रेज़ी पर निर्भर रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। चीन के वुहान विश्वविद्यालय से छू सलाउ ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

सत्र का संचालन गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार मिश्र ने किया, जबकि मराठी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. संदीप मधुकर सपकाले ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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