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July 1, 2026 2:19 pm

अमृत मिशन का 1.07 करोड़ भुगतान दिलाने की याचिका खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- संविदात्मक विवाद रिट के दायरे में नहीं

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अमृत मिशन योजना के तहत किए गए कार्यों के 1.07 करोड़ से अधिक के बकाया भुगतान की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि विशुद्ध रूप से संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) विवादों का निपटारा संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में संबंधित पक्ष को सक्षम सिविल न्यायालय अथवा कानून में उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपनाने होंगे।

मामला नागपुर की पुरानिक ब्रदर्स कंसल्टिंग इंजीनियर्स के प्रोपराइटर नितिन पुरुषोत्तम पुरानिक द्वारा दायर याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने दुर्ग जिले की कुम्हारी नगर पालिका के विरुद्ध अमृत मिशन योजना के अंतर्गत किए गए कार्यों के एवज में 1,07,46,671 के बकाया भुगतान की मांग की थी।

याचिका के अनुसार, 18 नवंबर 2020 को नगर पालिका ने एकीकृत जल संवर्धन परियोजना एवं सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तथा प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी का कार्य फर्म को सौंपा था। फर्म ने करीब दो वर्षों तक कार्य करने के बाद समय-समय पर रनिंग बिल प्रस्तुत किए, लेकिन नगर पालिका ने फंड उपलब्ध नहीं होने का हवाला देते हुए भुगतान नहीं किया। बाद में एक मार्च 2024 को यह कहते हुए वर्क ऑर्डर निरस्त कर दिया गया कि परियोजना को राज्य शासन एवं सूडा से स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ दुबे ने दलील दी कि फर्म ने अनुबंध के अनुरूप कार्य पूर्ण किया है तथा विभागीय पत्राचार से भी बकाया राशि निर्विवाद है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सूर्या कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि सरकार वित्तीय संकट का बहाना बनाकर स्वीकृत भुगतान नहीं रोक सकती।

वहीं, राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास तथा नगर पालिका की ओर से अधिवक्ता धीरज वानखेड़े ने तर्क दिया कि यह व्यावसायिक अनुबंध से उत्पन्न विवाद है, जिसमें कार्य की मात्रा, अनुबंध की शर्तों के पालन तथा भुगतान जैसे तथ्यात्मक प्रश्न शामिल हैं। ऐसे विवाद का निराकरण रिट क्षेत्राधिकार में संभव नहीं है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने कहा कि इस मामले में विवादित तथ्यों की जांच और साक्ष्यों के मूल्यांकन की आवश्यकता है। इसलिए अनुच्छेद-226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अधिकारियों को आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश मांग लेने से विवाद की संविदात्मक प्रकृति समाप्त नहीं हो जाती।

पीठ ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सूर्या कंस्ट्रक्शंस का निर्णय वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता, क्योंकि यहां परियोजना की स्वीकृतियों और अनुबंध के क्रियान्वयन से जुड़े विवादित तथ्य मौजूद हैं।

इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी। हालांकि, याचिकाकर्ता को बकाया राशि की वसूली के लिए कानून के तहत उपलब्ध अन्य सक्षम मंचों पर उचित कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी गई है। मामले में किसी भी पक्ष पर न्यायालय ने लागत (कॉस्ट) अधिरोपित नहीं की।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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