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April 22, 2026 9:42 pm

रेल पटरियों का आधुनिकीकरण: सुरक्षा, गति और विश्वसनीयता की नई तस्वीर

अश्विनी वैष्णव (लेखक, भारत सरकार के रेल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं)

छत्तीसगढ़। भारत में प्रतिदिन 25,000 से अधिक ट्रेनें संचालित होती हैं, जो 2 करोड़ से अधिक यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के साथ-साथ कोयला, लौह अयस्क, अनाज, स्टील और सीमेंट जैसे आवश्यक संसाधनों का परिवहन करती हैं। 1,37,000 किलोमीटर से अधिक लंबे रेल नेटवर्क की यह विशाल व्यवस्था जिस आधार पर टिकी है, वह है रेल पटरी। पटरियों की गुणवत्ता ही ट्रेनों की गति, समयबद्धता और सुरक्षा का निर्धारण करती है।

यदि रेल पटरी अच्छी स्थिति में होती है तो ट्रेनें अधिक गति से और सुरक्षित ढंग से चलती हैं, वहीं खराब पटरी गति में कमी, देरी और दुर्घटना के जोखिम को बढ़ाती है। पटरी में दरार, ढीले पुर्जे या गिट्टी की खराब स्थिति जैसी छोटी समस्याएं भी संचालन को प्रभावित कर सकती हैं।

इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय रेलवे ने एक दशक पहले व्यापक आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें पटरियों का नवीनीकरण, आधुनिक जांच तकनीकें, मशीनीकृत रखरखाव और सुरक्षा उपाय शामिल किए गए। इन प्रयासों से रेलवे नेटवर्क की गुणवत्ता में व्यापक सुधार देखने को मिला है।

नवीनीकरण और मजबूत पटरियों का विस्तार

वर्ष 2014 से अब तक लगभग 55,000 किलोमीटर रेल पटरियों का नवीनीकरण किया गया है। 44,000 ट्रैक किलोमीटर में 260 मीटर लंबे रेल पैनल बिछाए गए हैं, जिससे जोड़ कम हुए हैं और संचालन अधिक सुगम बना है। वर्तमान में 80,000 किलोमीटर से अधिक हिस्से में 60 किलोग्राम क्षमता वाली मजबूत रेल पटरियों का उपयोग किया जा रहा है, जो अधिक भार और उच्च गति को सहन करने में सक्षम हैं।

आधुनिक तकनीक से समय रहते खामियों की पहचान

रेल पटरियों की मजबूती के साथ-साथ उनकी नियमित जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। छिपी हुई दरारों की पहचान के लिए अल्ट्रासोनिक जांच तकनीक अपनाई गई है, जिसके तहत 36.2 लाख ट्रैक किलोमीटर और 2.25 करोड़ वेल्ड की जांच की जा चुकी है। इसके परिणामस्वरूप रेल और वेल्ड टूटने की घटनाओं में लगभग 90 प्रतिशत तक कमी आई है।

इसके अतिरिक्त चुंबकीय जांच, फ्लैश-बट वेल्ड परीक्षण और जीपीएस आधारित प्रणाली के माध्यम से ट्रैक की गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है, जिससे खराब हिस्सों की सटीक पहचान संभव हो पाती है।

मशीनीकरण से रखरखाव में तेजी और दक्षता

रेलवे में ट्रैक मशीनों की संख्या 2014 में 748 थी, जो 2026 में बढ़कर 1,785 हो गई है। ये मशीनें गिट्टी की सफाई, ट्रैक समतलीकरण और रेल ग्राइंडिंग जैसे कार्य तेजी और सटीकता से करती हैं। अब तक एक लाख किलोमीटर से अधिक ट्रैक पर गिट्टी की सफाई और रेल की ग्राइंडिंग का कार्य पूरा किया जा चुका है, जिससे यात्रा अधिक सुगम और सुरक्षित हुई है।

गिट्टी, जो पटरी के नीचे बिछाई जाती है, पानी निकासी, कंपन नियंत्रण और स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। समय के साथ इसके कण टूटकर पाउडर में बदल जाते हैं, जिससे इसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। मशीनों के माध्यम से इसकी सफाई कर पटरियों को पुनः बेहतर स्थिति में लाया गया है।

सुरक्षा के लिए अतिरिक्त उपाय

उच्च गति वाले मार्गों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगभग 17,500 किलोमीटर तक बाड़बंदी की गई है, जिससे जानवरों और लोगों के ट्रैक पर आने की घटनाएं कम हुई हैं।

इसके अलावा 36,000 नए और मजबूत स्विच तथा 7,500 उन्नत क्रॉसिंग लगाए गए हैं, जो ट्रेनों को बिना झटके के सुरक्षित रूप से गुजरने में मदद करते हैं। पुलों और यार्डों में भी मजबूत स्लीपर और लंबी वेल्ड पटरियों का उपयोग किया गया है।

गति क्षमता में उल्लेखनीय सुधार

आधुनिकीकरण का सबसे बड़ा प्रभाव ट्रेनों की गति क्षमता में वृद्धि के रूप में सामने आया है। 130 किमी प्रति घंटे उससे अधिक गति के लिए सक्षम ट्रैक का हिस्सा 6 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो गया है। वहीं 110 किमी प्रति घंटे या उससे अधिक गति वाली पटरियां अब 80 प्रतिशत तक पहुंच गई हैं। इससे यात्रा समय में कमी आई है और ट्रेनों की समयबद्धता में सुधार हुआ है।

रेल हादसों में भारी कमी

रेलवे सुरक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2014-15 में 135 बड़े रेल हादसे हुए थे, जो 2025-26 में घटकर मात्र 16 रह गए। प्रति 10 लाख किलोमीटर पर हादसों की दर 0.11 से घटकर 0.01 हो गई है, जो लगभग 90 प्रतिशत सुधार को दर्शाती है।

डिजिटल प्रबंधन प्रणाली से निगरानी आसान

रेलवे ने ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम नामक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी शुरू किया है, जिसमें ट्रैक की स्थिति, निरीक्षण और मरम्मत से जुड़ी सभी जानकारियां एक स्थान पर उपलब्ध रहती हैं। इससे समय पर निर्णय लेने और आवश्यक सुधार कार्यों को प्राथमिकता देने में मदद मिलती है।

बदलती तस्वीर, मजबूत भविष्य

बारह वर्ष पूर्व जहां 60 प्रतिशत रेल पटरियां 110 किमी प्रति घंटे से कम गति तक सीमित थीं और रखरखाव मुख्यतः मैन्युअल था, वहीं आज 80 प्रतिशत से अधिक नेटवर्क उच्च गति को संभालने में सक्षम है। रेल और वेल्ड टूटने की घटनाओं में भारी कमी आई है और आधुनिक मशीनों के उपयोग से कार्यक्षमता बढ़ी है।

इन सुधारों का सीधा लाभ लाखों यात्रियों और रेल आधारित उद्योगों को मिला है। यात्रा अधिक सुरक्षित, तेज और आरामदायक हुई है, जबकि माल ढुलाई में भी विश्वसनीयता बढ़ी है। यद्यपि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया अभी जारी है, लेकिन अब तक की उपलब्धियां यह दर्शाती हैं कि सतत निवेश और तकनीकी नवाचार से देश के आधारभूत ढांचे में व्यापक परिवर्तन संभव है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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