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September 12, 2026 8:23 pm

गणेश चतुर्थी : बुद्धि, विवेक और शुभारंभ का पावन पर्व

“भारतीय संस्कृति में भगवान श्री गणेश का स्थान सर्वोपरि माना गया है। हर शुभ कार्य का शुभारंभ देवों में प्रथम पूज्य भगवान गणपति के पूजन से किया जाता है। यही कारण है कि भारतीय धर्म एवं संस्कृति में पंचदेवों में भगवान गणेश को प्रथम स्थान प्राप्त है। सिद्धि, बुद्धि, समृद्धि और शुद्धि के इस पावन पर्व गणेश चतुर्थी के अवसर पर अंचल के ख्यातिप्राप्त कवि, साहित्यकार, विचारक एवं शिक्षाविद् डॉ. रविन्द्र कुमार द्विवेदी का यह आलेख प्रस्तुत है”

शशिभूषण सोनी,पूर्व सहायक प्राध्यापक (वाणिज्य),शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चांपा

CBN36 ।गणेश चतुर्थी भारत के प्रमुख और उत्साहपूर्ण पर्वों में से एक है। हिन्दू धर्म में यह पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। भगवान गणेश को ‘विघ्नहर्ता’, ‘बुद्धि’, ‘समृद्धि’ और ‘सौभाग्य’ के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व का पौराणिक, आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा एवं व्यापक है।

भगवान गणेश के प्राकट्य की कथा

गणेश चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथाएं भगवान गणेश की उत्पत्ति और उनके महान कार्यों का वर्णन करती हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से गणेश को उत्पन्न किया और उन्हें अपने द्वारपाल के रूप में नियुक्त किया। जब भगवान शिव घर लौटे और भीतर प्रवेश करना चाहा, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया, क्योंकि उन्हें माता पार्वती की आज्ञा का पालन करना था।

इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेश जी का सिर काट दिया। यह देखकर देवी पार्वती अत्यंत दुःखी और क्रोधित हो उठीं। देवी को शांत करने के लिए भगवान शिव ने गणेश जी को पुनर्जीवन प्रदान किया और उनके धड़ पर हाथी का मस्तक स्थापित कर दिया। तभी से भगवान गणेश गजानन, एकदंत और लंबोदर सहित अनेक नामों से पूजे जाने लगे।

भगवान गणेश की आराधना में प्रचलित प्रसिद्ध मंत्र है-

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थात-हे वक्रतुण्ड, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी भगवान! मेरे सभी कार्यों को सदैव निर्विघ्न पूर्ण करें।

यह श्लोक भगवान गणेश के विघ्नहर्ता स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। इसी कारण किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले सर्वप्रथम भगवान गणेश की पूजा की जाती है।

बुद्धि और विवेक के प्रतीक हैं गणेश

गणेश चतुर्थी का आध्यात्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का प्रतीक माना जाता है। उनका विशाल मस्तक ज्ञान और विवेक का प्रतीक है, जो जीवन के प्रत्येक पहलू को व्यापक दृष्टि से समझने की क्षमता का संदेश देता है। उनकी छोटी आंखें एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि का प्रतीक हैं। उनकी लंबी सूंड हमें यह संदेश देती है कि जीवन में स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म पक्षों को भी समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।

भगवान गणेश की आराधना में-

ॐ गं गणपतये नमः।

मंत्र का विशेष महत्व माना गया है। श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का जाप मन को एकाग्र करने, बुद्धि को जागृत करने और आध्यात्मिक चेतना को सुदृढ़ करने में सहायक माना जाता है।

भगवान गणेश का विशाल उदर धैर्य, सहनशीलता और जीवन के विविध अनुभवों को सहजता से स्वीकार करने की क्षमता का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में आने वाली चुनौतियों का धैर्यपूर्वक सामना करते हुए हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना चाहिए।

प्रथम पूज्य हैं भगवान गणेश

धार्मिक दृष्टि से भी गणेश चतुर्थी का महत्व अत्यधिक है। भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देव माना जाता है। किसी भी पूजा, हवन अथवा धार्मिक अनुष्ठान से पहले भगवान गणेश का पूजन किया जाता है, ताकि कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो।

उनकी स्तुति में कहा गया है-

संकटनाशनं गणेशं, विघ्नहर्ता नमो नमः।

सर्वकार्येषु सिद्धिं यान्तु, मंगलमूर्तये नमः॥

अर्थात संकटों का नाश करने वाले और विघ्नों को दूर करने वाले भगवान गणेश को बार-बार प्रणाम। हे मंगलमूर्ति! आपकी कृपा से सभी कार्य सफल हों और जीवन में मंगल का संचार हो।

दस दिनों तक गूंजता है ‘गणपति बप्पा मोरया’

गणेश चतुर्थी के अवसर पर भगवान गणेश की प्रतिमाएं घरों और सार्वजनिक स्थलों पर श्रद्धा एवं उत्साह के साथ स्थापित की जाती हैं। दस दिनों तक चलने वाले इस पर्व के दौरान भक्त विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, आरती करते हैं और भगवान को प्रिय मोदक सहित विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित करते हैं।

‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। गणेशोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक सहभागिता का भी संदेश देता है।

महाभारत के लेखन से भी जुड़ी है गणेश की कथा

भगवान गणेश के संबंध में एक प्रसिद्ध कथा महाभारत के लेखन से भी जुड़ी है। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की और उसके लेखन के लिए उन्हें एक योग्य लेखक की आवश्यकता थी। भगवान गणेश ने महाभारत लिखने का दायित्व स्वीकार किया। उन्होंने शर्त रखी कि वे निरंतर लेखन करेंगे और बीच में नहीं रुकेंगे।

महर्षि वेदव्यास ने भी शर्त रखी कि भगवान गणेश प्रत्येक श्लोक को पूरी तरह समझने के बाद ही उसे लिखेंगे। इस प्रकार दोनों के बीच ज्ञान, बुद्धि और लेखन की अद्भुत साधना का यह प्रसंग सामने आया। यह कथा भगवान गणेश की बुद्धिमत्ता, एकाग्रता, श्रमशीलता और त्वरित निर्णय क्षमता का प्रतीक मानी जाती है।

श्रीमहागणाधिपतये नमः।

यह मंत्र भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा और समर्पण की अभिव्यक्ति है तथा उनके आशीर्वाद से जीवन में सफलता और मंगल की कामना करता है।

गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला प्रेरणापर्व भी है। यह हमें जीवन की चुनौतियों का धैर्यपूर्वक सामना करने, विवेकपूर्ण निर्णय लेने और प्रत्येक कार्य को श्रद्धा, समर्पण एवं एकाग्रता के साथ करने की प्रेरणा देता है। भगवान गणेश का स्वरूप हमें सिखाता है कि ज्ञान के साथ विनम्रता, सामर्थ्य के साथ धैर्य और सफलता के साथ विवेक भी आवश्यक है।

पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिक संदेशों और धार्मिक परंपराओं से समृद्ध यह पर्व हमारे भीतर श्रद्धा, भक्ति, सद्भाव और सद्गुणों का संचार करता है। भगवान गणेश की आराधना हमें हर नई शुरुआत से पहले आत्मचिंतन, अनुशासन और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखने का संदेश देती है।

‘सिद्धिविनायकाय नमः’ का स्मरण करते हुए आइए, भगवान गणेश से अपने जीवन के सभी विघ्नों को दूर करने, सद्बुद्धि प्रदान करने और सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रार्थना करें।

आप सभी को गणेश चतुर्थी के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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