
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में मिली डॉक्टरेट उपाधि, शोध में मिले कैंसररोधी व प्रतिजैविक दवाओं के विकास के संकेत
CBN36 रायपुर/बिलासपुर। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के रूरल टेक्नोलॉजी विभाग ने जांजगीर-चांपा निवासी सुरभि पांडेय को पीएचडी की उपाधि प्रदान की है। उन्होंने डॉ. भास्कर चौरसिया के निर्देशन में काली हल्दी (कर्कुमा कैसीया) पर शोधकार्य पूरा किया। शोध का विषय आइसोलेशन एंड आइडेन्टीफिकेशन ऑफ एंडोफिटिक फंगई एंड देयर बायोएक्टिव मालीक्यूल्स फाम कुरकुमा कैसिया रोबेक्स रहा।
शोध प्रस्तुतीकरण के दौरान सुरभि ने बताया कि काली हल्दी एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से होता रहा है। शोध के तहत पौधे की पत्तियों और प्रकंद (राइजोम) से एंडोफाइटिक कवकों का पृथक्करण, उनकी पहचान और उनसे प्राप्त जैवसक्रिय अणुओं का अध्ययन किया गया।
अध्ययन में 22 एंडोफाइटिक कवकीय आइसोलेट प्राप्त हुए, जिनकी पहचान आकृतिक (मॉर्फोलॉजिकल) परीक्षण और MALDI-TOF तकनीक से की गई। चयनित कवकों में एंजाइम उत्पादन और प्रतिजैविक क्षमता का मूल्यांकन भी किया गया। वहीं पौधे और कवकीय अर्क का GC-MS विश्लेषण कर कई जैवसक्रिय यौगिकों की पहचान की गई।
शोध में इन यौगिकों की संभावित औषधीय उपयोगिता का आकलन HER2 प्रोटीन के विरुद्ध मॉलिक्यूलर डॉकिंग तकनीक से किया गया। इसमें कुछ यौगिकों ने बेहतर बाइंडिंग क्षमता दिखाई। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि काली हल्दी और उसके एंडोफाइटिक कवक भविष्य में नई प्रतिजैविक और कैंसररोधी दवाओं के विकास के साथ जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
सुरभि ने बताया कि एंडोफाइटिक कवक पौधों के ऊतकों के भीतर बिना नुकसान पहुंचाए रहते हैं और अल्कलॉइड, टेरपेनोइड तथा फिनोलिक यौगिक जैसे महत्वपूर्ण जैवसक्रिय अणुओं का उत्पादन करते हैं। इनका उपयोग चिकित्सा, कृषि और जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है।
पीएचडी की मौखिक परीक्षा के दौरान बाह्य परीक्षक ने शोध की गुणवत्ता की सराहना करते हुए इसे भविष्य के लिए उपयोगी बताया। सुरभि की माता पुष्पा पांडेय शिक्षिका हैं, जबकि पिता विजय पांडेय ने उनकी इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए इसे परिवार के लिए गौरव का क्षण बताया।
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