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July 20, 2026 1:42 pm

रक्षाबंधन पर रिश्तों के साथ हरियाली का भी बंधन, रायगढ़ की बीज राखियां बनीं पर्यावरण संरक्षण का संदेश

रायगढ़। रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में यह त्योहार पर्यावरण संरक्षण का भी मजबूत संदेश लेकर आया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान से जुड़ी स्व-सहायता समूहों की महिलाएं ऐसी अनोखी बीज राखियां’ तैयार कर रही हैं, जो केवल कलाई की शोभा नहीं बढ़ाएंगी, बल्कि समय आने पर धरती को भी हरा-भरा बनाने का माध्यम बनेंगी।

कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में जिला पंचायत रायगढ़ और बिहान के सहयोग से जिले के सातों विकासखंडों में महिलाओं ने इस अभिनव पहल को जनभागीदारी का रूप दिया है। इन राखियों में धान, मक्का, सेमी, करेला, बरबटी और अन्य देसी बीजों का उपयोग किया जा रहा है। त्योहार के बाद यदि राखी को मिट्टी में दबा दिया जाए या प्राकृतिक रूप से जमीन में मिल जाए, तो इसमें लगे बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले सकते हैं। इस तरह एक छोटी-सी राखी हरियाली का नया संदेश बन जाती है।

इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह परंपरा और पर्यावरण के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करती है। जहां एक ओर भाई की कलाई पर प्रेम का धागा बंधेगा, वहीं दूसरी ओर प्रकृति के संरक्षण का संकल्प भी मजबूत होगा। “भाई की कलाई पर प्यार, धरती मां को उपहार” की थीम पर तैयार की जा रही ये राखियां लोगों को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का एहसास करा रही हैं।

रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़, रायगढ़, लैलूंगा, तमनार, घरघोड़ा और पुसौर सहित सभी विकासखंडों में महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ बीज राखियां बनाना शुरू कर दिया है। धरमजयगढ़ के ग्राम दुलियामुड़ा-कोयलार की कृष्णा स्व-सहायता समूह की सदस्य कविता राठिया सहित अनेक महिला समूह इस नवाचार को सफल बनाने में जुटे हैं। कृषि सखियों और स्व-सहायता समूहों की यह पहल ग्रामीण महिलाओं की रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता का भी उदाहरण बन रही है।

इस नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए 20 जुलाई को सातों विकासखंडों से एक-एक सर्वश्रेष्ठ बीज राखी का चयन किया जाएगा। आकर्षक डिजाइन, देसी बीजों का उपयोग और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को चयन का प्रमुख आधार बनाया गया है। विजेता महिलाओं को 27 जुलाई को सम्मानित किया जाएगा और वे जिले के वरिष्ठ अधिकारियों, जिनमें कलेक्टर भी शामिल हैं, को अपने हाथों से तैयार की गई बीज राखियां बांधेंगी।

बदलते समय में जब प्लास्टिक और कृत्रिम सजावटी सामग्री से बने उत्पाद पर्यावरण के लिए चुनौती बन रहे हैं, तब रायगढ़ की महिलाओं की यह पहल एक सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करती है। यह संदेश देती है कि परंपराएं केवल निभाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उन्हें समाज और प्रकृति के हित में नई दिशा भी दी जा सकती है।

रायगढ़ की यह अभिनव पहल अब केवल एक प्रतियोगिता नहीं रही, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता का ऐसा अभियान बनती जा रही है, जो आने वाले समय में अन्य जिलों और राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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