वर्धा महाराष्ट्र।भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और यह पहचान आज भी कायम है। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती-किसानी पर निर्भर है। कृषि केवल खाद्यान्न उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़, रोजगार का प्रमुख स्रोत और देश की खाद्य सुरक्षा की आधारशिला भी है। हरित क्रांति से लेकर आधुनिक तकनीकों के प्रयोग तक भारतीय कृषि ने लंबा सफर तय किया है, लेकिन बदलते समय के साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं।
अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार
वर्तमान में देश के लगभग 42 से 45 प्रतिशत कार्यबल को कृषि रोजगार उपलब्ध कराती है, जबकि ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि की हिस्सेदारी 15 से 18 प्रतिशत के बीच है। भारत गेहूं, धान, गन्ना, दाल, कपास, मसाले, चाय, फल और सब्जियों के उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। 330 मिलियन टन से अधिक वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन भारत की कृषि क्षमता का प्रमाण है।
तकनीक से बदली खेती की तस्वीर
पिछले कुछ वर्षों में खेती में तकनीक का दायरा तेजी से बढ़ा है। उन्नत बीज, आधुनिक कृषि यंत्र, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, ड्रोन, डिजिटल कृषि सेवाएं, मोबाइल आधारित सलाह और मौसम पूर्वानुमान जैसी सुविधाएं किसानों तक पहुंच रही हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं ने कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने का प्रयास किया है।
चुनौतियां अब भी बरकरार
प्रगति के बावजूद भारतीय कृषि कई गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। देश का बड़ा हिस्सा आज भी मानसून पर निर्भर है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन के कारण फसल उत्पादन प्रभावित होता है। छोटे और बिखरे हुए खेत आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रभावी उपयोग में बाधा बनते हैं।
खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। बीज, उर्वरक, डीजल, बिजली और कृषि यंत्र महंगे होते जा रहे हैं, जबकि किसानों को कई बार उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ भी सभी किसानों तक नहीं पहुंच पाता। भंडारण और कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद खराब हो जाते हैं, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है। वहीं भूजल का अंधाधुंध दोहन और पर्यावरणीय असंतुलन भविष्य की खेती के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। कृषि ऋण का बढ़ता बोझ और प्राकृतिक आपदाएं किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर करती हैं।
समाधान की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, वर्षा जल संरक्षण और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देना जरूरी है। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती को गांव-गांव तक पहुंचाने के साथ किसानों को नियमित प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।
छोटे किसानों के लिए किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), सहकारी और सामूहिक खेती को बढ़ावा देने से लागत कम होगी और बाजार तक उनकी पहुंच मजबूत होगी। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने, भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं का विस्तार करने तथा बाजार व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जैविक खेती, संतुलित उर्वरकों और मृदा स्वास्थ्य कार्ड के उपयोग को बढ़ावा देना होगा। साथ ही सस्ती कृषि ऋण सुविधा और प्रभावी फसल बीमा व्यवस्था किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर सकती है।
भारतीय कृषि आज परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। एक ओर तकनीक, सरकारी योजनाएं और उत्पादन क्षमता नए अवसर पैदा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत और बाजार संबंधी चुनौतियां किसानों के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि कृषि विकास को केवल उत्पादन तक सीमित न रखकर किसानों की आय, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ खेती से जोड़ा जाए।
यदि वैज्ञानिक खेती, प्रभावी नीतियों, बेहतर बाजार व्यवस्था और जल संरक्षण पर समान रूप से ध्यान दिया जाए तो भारतीय कृषि न केवल देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाए रखेगी, बल्कि आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत के निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।
मो. सोहैल अली
परास्नातक (इतिहास), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)
प्रधान संपादक


