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July 12, 2026 12:48 am

डीएनए रिपोर्ट और साक्ष्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने पॉक्सो व अपहरण मामले में आरोपी को किया बरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पॉक्सो अधिनियम एवं अपहरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी लक्ष्मीनारायण उर्फ लक्ष्मण (30 वर्ष), निवासी फलोदी, जोधपुर (राजस्थान) को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

रायपुर की प्रथम फास्ट ट्रैक विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 27 सितंबर 2024 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता आईपीसी की धारा 363, 366 तथा POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए अधिकतम 20 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी 1 जून 2022 से न्यायिक हिरासत में था।

क्या था मामला

24 मई 2022 को रायपुर के डीडी नगर थाना क्षेत्र की 17 वर्ष 3 माह की एक स्कूली छात्रा घर से निकली और वापस नहीं लौटी। पिता की शिकायत पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज किया गया। 31 मई 2022 को पुलिस ने छात्रा को मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से बरामद किया। जांच में सामने आया कि वह आरोपी के साथ नागपुर, जोधपुर और छिंदवाड़ा गई थी। मेडिकल परीक्षण में उसके गर्भवती होने की पुष्टि हुई, जिसके बाद एम्स रायपुर में चिकित्सकीय गर्भसमापन कराया गया।

अपील में आरोपी की प्रमुख दलीलें

उच्च न्यायालय में आरोपी की ओर से अधिवक्ता बी.पी. सिंह ने तर्क दिया कि पीड़िता अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी। यात्रा के दौरान वह रेलवे स्टेशन, बसों और होटलों में रही, लेकिन कहीं भी उसने विरोध नहीं किया और न ही किसी से सहायता मांगी।

बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि गर्भपात के बाद सुरक्षित किए गए भ्रूण की राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में कराई गई डीएनए जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि आरोपी उस भ्रूण का जैविक पिता नहीं है। साथ ही, पीड़िता को बहला-फुसलाकर ले जाने का कोई ठोस साक्ष्य भी अभियोजन प्रस्तुत नहीं कर सका।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

खंडपीठ ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि अपहरण के अपराध के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि आरोपी ने पीड़िता को सक्रिय रूप से बहला-फुसलाकर या अभिभावकों की अभिरक्षा से दूर ले जाने में भूमिका निभाई हो।

अदालत ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार पीड़िता ने आरोपी के साथ लंबी यात्रा की और उसके साथ लगातार रही। इसके अलावा, DNA रिपोर्ट में आरोपी का भ्रूण का जैविक पिता न होना अभियोजन के मामले पर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।

पीठ ने कहा कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। ऐसे में आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए रायपुर की फास्ट ट्रैक पॉक्सो कोर्ट द्वारा 27 सितंबर 2024 को पारित दोषसिद्धि एवं सजा के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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