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July 11, 2026 11:16 pm

सहायक प्राध्यापक राजनीति शास्त्र नियुक्ति मामले में हाई कोर्ट ने जांच के दिए निर्देश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सहायक प्राध्यापक राजनीति शास्त्र की नियुक्ति से जुड़े एक मामले में उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को जांच कर 120 दिनों के भीतर विधि अनुसार निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।

मामला रायगढ़ निवासी अली हसन की याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि चयनित अभ्यर्थी रंजन तिवारी की नियुक्ति निरस्त कर उन्हें अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची से नियुक्त किया जाए।

याचिका के अनुसार, CGPSC ने वर्ष 2019 में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) के 59 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। वर्ष 2021 में घोषित अंतिम परिणाम में अली हसन अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर रहे। अली हसन का आरोप है कि मुख्य चयन सूची में शामिल रंजन तिवारी पहले से ही हरियाणा सरकार के उच्चतर शिक्षा निदेशालय में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) के पद पर 13 फरवरी 2020 से कार्यरत थे।

याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर दावा किया कि रंजन तिवारी ने CGPSC की परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए अपने नियोक्ता से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्राप्त नहीं किया था। इसके बावजूद उन्हें 29 अप्रैल 2022 को शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भाटापारा (जिला बलौदाबाजार-भाटापारा) में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति दी गई।

याचिका की अंतिम सुनवाई 2 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने दलील दी कि CGPSC के विज्ञापन की कंडिका-4 के अनुसार, यदि कोई अभ्यर्थी किसी शासकीय, अर्धशासकीय विभाग या निकाय में कार्यरत है तो उसे साक्षात्कार अथवा नियुक्ति के समय नियोक्ता का अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने अथवा गलत जानकारी देने की स्थिति में अभ्यर्थी की सेवा समाप्त की जा सकती है तथा उसके विरुद्ध विधि अनुसार कार्रवाई भी की जा सकती है।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भाटापारा से RTI के तहत प्राप्त जानकारी में बताया गया कि रंजन तिवारी ने 23 मई 2022 को पदभार ग्रहण किया, लेकिन उनके द्वारा अनापत्ति प्रमाण-पत्र कार्यालय में प्रस्तुत नहीं किया गया।

मामले की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया आरोपों की जांच आवश्यक मानते हुए उच्च शिक्षा विभाग के सचिव तथा छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को निर्देश दिया कि वे मामले की जांच कर आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 120 दिनों के भीतर विधि के अनुसार उचित निर्णय लें। इसके साथ ही न्यायालय ने रिट याचिका का निराकरण कर दिया।न्यायालय ने इस आदेश में किसी पक्ष को दोषी घोषित नहीं किया है। विभागीय जांच के बाद ही मामले में अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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