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June 8, 2026 2:43 pm

सब तेरा से सब मेरा तक: पर्यावरण संकट और हमारी चेतना की परीक्षा

(विश्व पर्यावरण दिवस पर एक विशेष दृष्टिकोण)

विश्व पर्यावरण दिवस की आप सभी को शुभकामनाएँ। शुभकामनाएँ इसलिए कि आज भी हमें अपने हिस्से की शुद्ध हवा और पीने योग्य पानी उपलब्ध है। किंतु जिस गति से प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण हो रहा है, आने वाले समय में ये बुनियादी आवश्यकताएँ भी दुर्लभ हो सकती हैं।

आज का मनुष्य एक विचित्र विरोधाभास में जी रहा है। वह सीमेंट और कंक्रीट से बने बंद कमरों में बैठकर मोबाइल स्क्रीन पर जंगलों, नदियों और पक्षियों की कृत्रिम ध्वनियों में सुकून तलाशता है। विकास की अंधी दौड़ में हमने वास्तविक प्रकृति को स्क्रीन तक सीमित कर दिया है, जबकि धरातल पर जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं।

वास्तव में आधुनिक मनुष्य एक बड़े भ्रम का शिकार है। उसने मान लिया है कि ‘प्रकृति’ और ‘मानव’ दो अलग-अलग इकाइयाँ हैं। जबकि सत्य यह है कि मनुष्य स्वयं प्रकृति का ही एक अभिन्न हिस्सा है। हमारी प्रत्येक साँस इस संबंध की गवाही देती है। जो ऑक्सीजन हम ग्रहण करते हैं, वह पेड़ों की देन है। जो पानी हम पीते हैं, वह प्रकृति के जलचक्र का हिस्सा है। हमारी थाली का भोजन इसी मिट्टी की कोख से जन्म लेता है। जब हमारा अस्तित्व ही प्रकृति पर आधारित है, तो हम स्वयं को उससे अलग कैसे मान सकते हैं?

यदि हम आधुनिक जीवन के शोर को कुछ क्षणों के लिए शांत कर दें, तो पहाड़ों के टूटने की आहट और जंगलों के सिमटने की पीड़ा स्पष्ट महसूस की जा सकती है। अंधाधुंध शहरीकरण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर चुनौती दी है।

वैश्विक वैज्ञानिक रिपोर्टें भी इस संकट की पुष्टि करती हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार दुनिया हर वर्ष करोड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र खो रही है। वैश्विक तापमान औद्योगिक युग से पहले की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ चुका है, जिसके परिणामस्वरूप मौसम चक्र अधिक अनिश्चित और चरम होता जा रहा है। भारत में भी अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और जल संकट एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है।

सच तो यह है कि हम सब, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं। हम केवल अपने समय का पर्यावरण नहीं बिगाड़ रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हिस्से की स्वच्छ हवा, साफ पानी और सुरक्षित भविष्य को भी जोखिम में डाल रहे हैं।

यही कारण है कि आज पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन गई है। हमें अपनी सोच में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने की जरूरत है। जब तक हम प्रकृति को ‘किसी और की जिम्मेदारी’ मानते रहेंगे, तब तक उसके संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता अधूरी रहेगी। लेकिन जिस दिन हम यह महसूस करेंगे कि जंगल, नदियाँ, पहाड़ और जैव विविधता हमारी अपनी धरोहर हैं, उसी दिन संरक्षण की भावना स्वाभाविक रूप से जन्म लेगी।

पर्यावरण से मानसिक दूरी ही पर्यावरण विनाश की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। हमने धरती को केवल एक ‘संसाधन’ समझ लिया है, जबकि वास्तव में यही हमारा ‘स्रोत’ है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि हमारी निजी संपत्ति—जैसे कोई वाहन या प्रिय वस्तु—क्षतिग्रस्त हो जाए, तो हमें स्वाभाविक रूप से दुख और आक्रोश होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम उसे ‘अपना’ मानते हैं। ठीक इसी प्रकार का अपनत्व हमें अपने पर्यावरण के प्रति भी विकसित करना होगा। जब कोई पेड़ कटे, कोई नदी प्रदूषित हो या कोई पहाड़ खनन की चोट से क्षत-विक्षत हो, तो हमें वैसी ही पीड़ा महसूस होनी चाहिए जैसी अपनी किसी मूल्यवान वस्तु के नष्ट होने पर होती है।

अपनत्व और सह-अस्तित्व की यह भावना कोई नई अवधारणा नहीं है। भारत का आदिवासी समाज सदियों से इसका जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता आया है। अनेक जनजातीय समुदाय जंगलों, पहाड़ों और जीव-जंतुओं को केवल संसाधन नहीं, बल्कि अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा मानते हैं। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितनी आवश्यकता होती है और उसके प्रति सम्मान का भाव बनाए रखते हैं। आधुनिक समाज के लिए यह दृष्टिकोण आज भी एक महत्वपूर्ण सीख है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमने पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकारों और संस्थाओं पर छोड़ दी है। हम अक्सर मान लेते हैं कि पर्यावरण बचाना किसी विभाग, कानून या संगठन का काम है। जबकि वास्तविकता यह है कि कोई भी कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक समाज की चेतना उसके साथ न हो। पर्यावरण संरक्षण अंततः प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार और मूल्यों से जुड़ा विषय है।

हमें अब ऐसे विकल्प चुनने होंगे जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलें। हमें प्रकृति से उतना ही लेना होगा जितनी वास्तविक आवश्यकता हो। आवश्यकता से अधिक उपभोग, उपयोग नहीं बल्कि दोहन है।

पर्यावरणीय प्रभाव केवल बड़ी फैक्ट्रियों, खदानों या वाहनों तक सीमित नहीं है। हमारी रोज़मर्रा की जीवनशैली, उपभोग की आदतें और संसाधनों के प्रति हमारा रवैया भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कपड़ों के उत्पादन से लेकर खाद्यान्न उगाने और उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण तक, हर वस्तु के पीछे पानी, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी मात्रा खर्च होती है। इसलिए भोजन की बर्बादी, अनावश्यक खरीदारी और अत्यधिक उपभोग केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नुकसान भी है।

यदि वर्तमान उपभोग की प्रवृत्तियाँ इसी प्रकार जारी रहीं, तो भविष्य में पृथ्वी के संसाधनों पर दबाव और बढ़ेगा। इसलिए प्लास्टिक के विकल्पों को अपनाना, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को प्रोत्साहित करना अब केवल एक पसंद नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।

हमें यह समझना होगा कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक विस्तार नहीं है। वास्तविक विकास वही है जो प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किए बिना मानव जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए। सतत विकास को केवल नीतियों और पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय हमें उसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

प्रकृति पर कोई अहसान मत कीजिए। उसे अपना मानिए, उससे जुड़िए, क्योंकि अंततः हमारा अस्तित्व भी इसी मिट्टी से है। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा वर्तमान और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रह सकेगा।

(लेखन,उमेश कुमार राम शोधार्थी (PhD), समाजशास्त्र एवं सामाजिक मानवशास्त्र विभाग हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला, भारत)

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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