बिना जांच और प्रमाण कोल, जमीन, शराब दवाई माफिया लिखने पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने कहा-यह हो सकता है मानहानि
बिलासपुर। जिले में इन दिनों कुछ डिजिटल पोर्टलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर माफिया शब्द का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। कोयला परिवहन से जुड़े व्यक्ति को कोल माफिया जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों को जमीन माफिया और वैध लाइसेंसधारी कारोबारियों को भी माफिया बताकर खबरें प्रकाशित करने का चलन बढ़ा है।इस प्रवृत्ति को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।
विशेषज्ञों की माने तो माफिया शब्द का उपयोग सामान्य नहीं, बल्कि अत्यंत गंभीर संदर्भ में किया जाना चाहिए। यह शब्द उन संगठित आपराधिक गिरोहों के लिए प्रयुक्त होता है, जो अवैध गतिविधियों को योजनाबद्ध तरीके से संचालित करते हैं, जिनका नेटवर्क व्यापक होता है और जिन पर कानून के तहत ठोस आरोप या कार्रवाई दर्ज होती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल किसी व्यक्ति का किसी व्यवसाय-जैसे कोयला, जमीन या शराब-से जुड़ा होना उसे माफिया की श्रेणी में नहीं रखता। जब तक किसी के खिलाफ सक्षम प्राधिकारी द्वारा अपराध सिद्ध न हो या पुख्ता साक्ष्य न हों, तब तक इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना उचित नहीं है। ऐसा करना भारतीय कानून के तहत मानहानि की श्रेणी में आ सकता है।
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, जिले में अवैध गतिविधियों पर निगरानी के लिए पुलिस और संबंधित विभाग समय-समय पर कार्रवाई करते हैं। यदि कहीं भी अनियमितता पाई जाती है, तो नियमानुसार प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई की जाती है। लेकिन जांच से पहले किसी को दोषी ठहराना या माफिया घोषित करना न्यायसंगत नहीं माना जाता।
मीडिया विश्लेषकों का भी कहना है कि पत्रकारिता का मूल आधार तथ्यों की पुष्टि और संतुलन है। सनसनीखेज शब्दों के उपयोग से पाठकों का ध्यान भले आकर्षित हो, लेकिन इससे समाचार की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और समाज में भ्रम की स्थिति बनती है।
क्या कहते हैं नियम और नैतिकता
समाचार लिखना अच्छा है लेकिन बिना प्रमाण किसी पर गंभीर आरोप लगाना अनुचित जांच से पहले दोष तय करना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत समाचार में संतुलन और सभी पक्षों का उल्लेख जरूरी है लेकिन माफिया जैसे शब्द का प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां संगठित अपराध के स्पष्ट प्रमाण और आधिकारिक पुष्टि मौजूद हो। अन्यथा, यह न सिर्फ संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
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