
रायपुर, 03 अप्रैल 2026।छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय बोलियाँ भाषा की समृद्धि और विविधता की प्रतीक हैं। ये बोलियाँ भाषा रूपी मुकुट में जड़ी रत्न मणियों की तरह होती हैं, जो उसकी सुंदरता और मजबूती को बढ़ाती हैं। यह विचार साहित्य अकादमी, नई दिल्ली एवं संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘साहित्योत्सव 2026’ में छत्तीसगढ़ की वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती शकुंतला तरार ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक बोली का अपना विशिष्ट लहजा, लोकगीत और शब्दकोश होता है, जो भाषा को जीवंत और प्रभावशाली बनाता है। छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंडी, कुडुख, भतरी, बंजारी, मुरिया, माड़िया, धुरवा, दोरला, कोरवा, बैगानी, भुंजिया, धनवारी और सावरा जैसी बोलियाँ इस विविधता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

श्रीमती तरार ने बताया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में 18 स्थानीय बोलियों में कक्षा 1 से 5 तक शिक्षा की व्यवस्था की गई है, जिससे इन बोलियों के संरक्षण और संवर्धन को बल मिला है। उन्होंने कहा कि बोलियाँ समाज का दर्पण होती हैं और इनके माध्यम से लोकजीवन की झलक मिलती है।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने पुरुष प्रधान पंडवानी परंपरा में नई ऊर्जा का संचार किया। कापालिक शैली की पहली महिला कलाकार के रूप में उन्होंने महाभारत की कथा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ी भाषा और बोली को व्यापक पहचान दिलाई।
उल्लेखनीय है कि साहित्य अकादमी एवं संस्कृति मंत्रालय द्वारा ‘साहित्योत्सव 2026’ का आयोजन 30 मार्च से 4 अप्रैल तक नई दिल्ली में किया जा रहा है। इस महोत्सव में 100 से अधिक सत्रों में 650 से ज्यादा लेखक और विद्वान भाग ले रहे हैं, वहीं देश की 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व हो रहा है।शकुंतला तरार के विचारों को साहित्यकारों और भाषाविदों ने सराहते हुए उन्हें बधाई दी है।
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