बिलासपुर। हाई कोर्ट ने कहा कि कानून की जानकारी नहीं होना या गरीबी कोर्ट के मामले में देरी को माफ करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं माने जा सकते। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने 97 दिनों की देरी से पेश याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि समय सीमा का कानून जनहित और न्याय की निश्चितता पर आधारित है।
दुर्ग निवासी अभिषेक शर्मा रायपुर के फैमिली कोर्ट द्वारा 17 जुलाई 2025 को भरण-पोषण के संबंध में पारित एक आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका पेश की थी। लेकिन याचिका निर्धारित समय सीमा के 97 दिन बाद पेश की गई थी। आवेदक ने विलंब की माफी के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें तर्क दिया कि चह गरीब ग्रामीण है। उसे कानूनी प्रक्रियाओं और याचिका पेश करने की समय सीमा की जानकारी नहीं थी। वकील से सलाह मिलने और आदेश की प्रमाणित कॉपी मिलने के बाद बिना किसी और देरी के याचिका पेश की थी। इस देरी को अनजाने में हुई भूल मानकर न्याय के हित में माफ करने का आग्रह किया गया था।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश शासन विरुद्ध रामकुमार चौधरी समेत अन्य मामलों का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक तंगी या कानूनी मार्गदर्शन की कमी सहानुभूति पैदा कर सकती है, लेकिन इसे कानून की नजर में पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। कानून उन्हीं की सहायता करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं। आवेदक लंबे समय तक निष्क्रिय रहा और केवल कानूनी सहायता मिलने के बाद ही सक्रिय हुआ, यह पर्याप्त कारण नहीं है।
हाई कोर्ट ने कहा कि देरी को उदारतापूर्वक माफ करना पत्नी और बच्चे के अधिकारों के साथ अन्याय होगा, जिन्हें कानून की सीमा के कारण एक अधिकार प्राप्त हो चुका है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है।
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