डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि स्वच्छ ऊर्जा विकसित भारत के देश के विजन में गहराई से समाहित है
डॉ. मिश्र ने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा के लाभ सीधे परिवारों तक पहुँचते हैं, जो उपभोक्ताओं को ऊर्जा प्रणाली में सक्रिय भागीदार और उत्पादक के रूप में बदल देते हैं
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी. के. मिश्र ने आज इंटीग्रेटेड रिसर्च एंड एक्शन फॉर डेवलपमेंट (IRADe) में ‘सस्टेनेबल एनर्जी ट्रांज़िशन – ग्लोबल पर्सपेक्टिव’ पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि स्वच्छ ऊर्जा विकसित भारत के देश के विजन में गहराई से समाहित है। उन्होंने कहा कि अब यह केवल एक सेक्टर का एजेंडा नहीं रह गया है, बल्कि यह विकास, प्रतिस्पर्धात्मकता, सामाजिक समावेश और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
डॉ. मिश्र ने पिछले वर्ष इंडिया एनर्जी वीक के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों से प्रेरणा लेते हुए कहा, “एक विकसित भारत का निर्माण स्वच्छ ऊर्जा, हरित विकास और सतत जीवनशैली पर होगा।” उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से भारत के ऊर्जा बदलाव दो प्रमुख सबक प्रदान करते हैं। पहला, महत्वाकांक्षी लक्ष्य तभी विश्वसनीयता प्राप्त करते हैं जब उन्हें संस्थागत ढांचे, निरंतर वित्तीय प्रतिबद्धता और निरंतर निष्पादन का समर्थन प्राप्त हो। भारत द्वारा 2030 के बजाय 2025 तक स्वच्छ ऊर्जा की 50 प्रतिशत स्थापित क्षमता हासिल करने की क्षमता, और 100 GW सौर क्षमता को अपेक्षा से बहुत पहले प्राप्त करना, नीतिगत निरंतरता और संस्थागत मजबूती के महत्व को दर्शाता है। दूसरा, ऊर्जा बदलाव सबसे अधिक टिकाऊ तब होता है जब वह प्रत्यक्ष कल्याणकारी लाभ प्रदान करता है। डॉ. मिश्र ने आगे कहा कि किसानों पर पीएम-कुसुम का प्रभाव, परिवारों के लिए पीएम सूर्य घर से मिलने वाली राहत और सौर विनिर्माण तथा इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के माध्यम से पैदा हुए रोजगार यह दर्शाते हैं कि डीकार्बोनाइजेशन और विकास एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय मजबूत कर सकते हैं।
डॉ. मिश्र ने एनर्जी सिक्योरिटी, अफोर्डेबिलिटी और यूनिवर्सल एक्सेस पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने अपनी राय व्यक्त की कि ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के लिए यह बदलाव न्यायसंगत, समावेशी और विकास के अनुरूप होना चाहिए—जिसमें अलग-अलग जिम्मेदारियों, राष्ट्रीय परिस्थितियों और निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को मान्यता दी गई हो।
डॉ. मिश्र ने आशावाद के साथ कहा कि भारत ने 2005 और 2020 के बीच अपने सकल घरेलू उत्पाद की एमिशन इंटेंसिटी को लगभग 36 प्रतिशत तक कम कर दिया है और वह 2030 की समय-सीमा से नौ साल पहले ही अपने पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने वाला पहला जी-20 देश बन गया है। उन्होंने आगे कहा कि इसी पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में हमें भारत की एनर्जी ट्रांज़िशन रणनीति को देखना चाहिए।
डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण ने भी डीकार्बनाइजेशन और एनर्जी सिक्योरिटी में योगदान दिया है। सरकार द्वारा की गई कई पहलों पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय सौर मिशन की गति को तेज करते हुए सौर लक्ष्य को 20 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट कर दिया गया है, 2016 में नेशनल टैरिफ पॉलिसी में संशोधन किए गए और जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति (2018) लाई गई। प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस 2021 पर घोषित राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन ने अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्त करने और दीर्घकालिक जीवाश्म ईंधन आयात को कम करने के साधन के रूप में ग्रीन हाइड्रोजन की ओर एक बड़े बदलाव का संकेत दिया है।
डॉ. मिश्र ने रेखांकित किया कि भारत ने हालिया विधायी पहलों के माध्यम से परमाणु ऊर्जा को निजी भागीदारी के लिए खोलकर एक ऐतिहासिक सुधार किया है। इससे 2047 तक परमाणु क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि होने और एक स्थिर, ज़ीरो-कार्बन बेहतर बेसलोड बिजली प्राप्त होने की उम्मीद है। डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि कुल मिलाकर, ये उपाय एनर्जी ट्रांजिशन को सीधे ऊर्जा सुरक्षा और आयात में कमी के साथ जोड़ते हैं, जिससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ती है।
डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि पीएम-कुसुम पॉलिसी कन्वर्जेंस का एक उत्कृष्ट उदाहरण है: एनर्जी ट्रांज़िशन, कृषि में लचीलापन, वित्तीय स्थिरता और ग्रामीण विकास को एक-दूसरे को मजबूत करने वाले तरीके से समर्थन प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि बायोफ्यूल्स प्रोग्राम कार्यक्रम इस ग्रामीण परिवर्तन को और अधिक गहरा बनाता है।
डॉ. मिश्र ने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा के लाभ सीधे घरों तक पहुँचते हैं, जो उपभोक्ताओं को ऊर्जा प्रणाली में सक्रिय भागीदार और उत्पादक के रूप में बदल देते हैं। उन्होंने आगे उल्लेख किया कि भारत ने पहले ही लगभग शत-प्रतिशत घरेलू विद्युतीकरण हासिल कर लिया है, जिससे यह सुनिश्चित हुआ है कि स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार सामाजिक समावेश के साथ मेल खाता है। इसी को आगे बढ़ाते हुए, 2024 में शुरू की गई पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना स्वच्छ ऊर्जा को सीधे छतों तक ले आई है। बिल्डिंग कोड और दक्षता मानकों के साथ-साथ, उजाला एलईडी कार्यक्रम ऊर्जा दक्षता को भारत की लो-कार्बन डेवलपमेंट स्ट्रेटेजी का आधार स्तंभ बनाते हैं।
डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट (LiFE) मूवमेंट की शुरुआत एक महत्वपूर्ण कदम था, क्योंकि इसने सस्टेनेबिलिटी के दृष्टिकोण से तकनीक के साथ-साथ व्यवहारिक परिवर्तन के महत्व को भी मान्यता दी। उन्होंने कहा कि इन उपायों के साथ, भारत अपने पेरिस लक्ष्यों को समय से काफी पहले पूरा करने वाला पहला जी 20 देश बन गया है और अब उसने घोषित समय-सीमा से पहले ही 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्थापित बिजली क्षमता का आंकड़ा पार कर लिया
सौर पीवी मॉड्यूल्स के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना पर डॉ. मिश्र ने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की ओर एक निर्णायक बदलाव में इसके महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि 2022 से अब तक सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता लगभग 120 गीगावाट तक बढ़ गई है, जो कि लगभग 82 गीगावाट की वृद्धि है। डॉ. मिश्र ने आगे कहा कि इसे उन्नत बैटरी निर्माण और अन्य स्वच्छ-ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के समर्थन से और मजबूती मिली है।
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के बारे में बात करते हुए डॉ. मिश्र ने कहा कि यह 112 सूर्य-समृद्ध राष्ट्रों, जहां खूब धूप पड़ती है, को एक साथ लाता है, जिनमें मुख्य रूप से ग्लोबल साउथ के देश शामिल हैं और भारत इसमें एक प्रमुख संयोजक और ज्ञान भागीदार नॉलेज पार्टनर के रूप में कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि पंचामृत के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं, पेरिस लक्ष्यों को समय से पहले हासिल करने और लाइफ मिशन की शुरुआत ने वैश्विक जलवायु अग्रज के रूप में भारत की भूमिका को और मजबूत किया है।
डॉ. मिश्र ने दृढ़तापूर्वक कहा कि भारत ने लगातार अलग-अलग ज़िम्मेदारियों की मान्यता, क्लाइमेट फाइनेंस बढ़ाने और सार्थक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की वकालत की है। उभरती प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जैसे-जैसे अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ती है, सिस्टम की विश्वसनीयता और ग्रिड स्थिरता अधिक जटिल हो जाती है। भारत ने ट्रांसमिशन में अधिक निवेश, जिसमें HVDC कॉरिडोर शामिल हैं और स्टोरेज समाधानों के विस्तार के माध्यम से इसका समाधान किया है।
डॉ. मिश्र ने उल्लेख किया कि निकट भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोयले की भूमिका बनी रहेगी। भारत का दृष्टिकोण इस वास्तविकता को स्वीकार करता है और साथ ही उत्सर्जन तीव्रता को लगातार कम करने और कोयला गैसीकरण तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के विविधीकरण जैसे विकल्पों की खोज कर रहा है। जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी तक पहुंच ग्लोबल साउथ के लिए बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं। डॉ. मिश्र ने दृढ़तापूर्वक कहा कि भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि जलवायु कार्रवाई की जड़ें निष्पक्षता और जलवायु न्याय में होनी चाहिए, और इसके लिए पर्याप्त, पूर्वानुमानित और किफायती वित्त अनिवार्य है।
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