बिलासपुर। हाई कोर्ट के डीविजन बेंच अपने अहम फैसले में कहा है, अदालतों में कार्यरत कोई भी कर्मचारी सेवा में रहते हुए रेगुलर स्टूडेंट के तौर पर डिग्री हासिल नहीं कर सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश को रद्द कर दिया है।
सिंगल बेंच ने कोर्ट के एक कर्मचारी को नियमित छात्र के तौर पर LLB फाइनल ईयर की पढ़ाई करने की अनुमति दी थी। रायपुर जिला कोर्ट में असिस्टेंट ग्रेड-3 के पद पर कार्यरत अजीत चौबेलाल गोहर ने अपनी परिवीक्षा अवधि के दौरान एलएलबी की पढ़ाई शुरू की थी। उसे प्रथम और द्वितीय वर्ष की अनुमति दी गई थी, लेकिन सत्र 2025-26 में तीसरे वर्ष की अनुमति देने से विभाग ने इनकार कर दिया था। विभाग का कहना था कि नए नियमों के तहत नियमित छात्र के रूप में पढ़ाई की अनुमति नहीं दी जा सकती।
विभाग के फैसले के खिलाफ कर्मचारी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई करते हुए सिंगल बेंच सिंगल बेंच ने कहा था कि चूंकि उसने दो साल की पढ़ाई पूरी कर ली है, इसलिए तीसरे वर्ष की अनुमति मिलनी चाहिए। हाई कोर्ट प्रशासन ने रजिस्ट्रार जनरल के जरिए इस फैसले के खिलाफ डीविजन बेंच के समक्ष अपील पेश की थी।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने नए नियमों का हवाला देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ जिला न्यायपालिका स्थापना नियम 2023 के नियम 11 के तहत कोई भी कर्मचारी नियमित उम्मीदवार के रूप में परीक्षा में शामिल नहीं हो सकता। केवल निजी या पत्राचार के माध्यम से ही पढ़ाई की जा सकती है। हाई कोर्ट ने सिंगल बेंच के 10 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही विभाग द्वारा 4 सितंबर 2025 को कर्मचारी को अनुमति देने से इनकार करने के आदेश को बरकरार रखा है।
0 कार्यालय के कामकाज और प्रशासनिक अनुशासन पर पड़ता है असर
सुनवाई के दौरान डीविजन बेंच ने पाया कि सिंगल बेंच ने विभाग को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना ही पहली सुनवाई में आदेश जारी कर दिया था। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है। डीविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, नियमित छात्र की तरह पढ़ाई करने से कार्यालय के कामकाज और प्रशासनिक अनुशासन पर सीधा असर पड़ता है। इस टिप्पणी के साथ सिंगल बेंच के फैसले को रद्द कर दिया है।
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