CBN 36 वर्धा, 27 जुलाई। वर्धा जिले के प्रादेशिक वन क्षेत्र में पहली बार अति दुर्लभ एल्बिनो बुलबुल (सफेद बुलबुल) देखी गई है। यह महत्वपूर्ण खोज महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के मानवविज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं वन्यजीव प्रेमी डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव ने अपने प्रकृति प्रेमी साथियों डॉ. पीयूष पतंजलि और समीर अवस्थी के साथ रविवार को की।
वन क्षेत्र में भ्रमण के दौरान सड़क किनारे बैठी चिड़ियों के झुंड में एक असामान्य रूप से सफेद रंग की बुलबुल दिखाई दी। करीब जाकर डॉ. यादव ने उसकी पूंछ के नीचे मौजूद लाल धब्बे (वेंट) के आधार पर उसे एल्बिनो बुलबुल के रूप में पहचाना। इसके बाद उन्होंने मोबाइल से ली गई तस्वीर पक्षी विशेषज्ञ एवं वनरक्षक मनेशकुमार लिंगुराम सज्जन को भेजी। सूचना मिलते ही वनरक्षक मनेशकुमार लगभग 40 किलोमीटर दूर घटनास्थल पर पहुंचे और डॉ. यादव के साथ जंगल के भीतर जाकर पक्षी की तस्वीरें और वीडियो वैज्ञानिक अध्ययन के लिए रिकॉर्ड किए।

डॉ. यादव ने बताया कि लगभग 30 हजार पक्षियों में से केवल एक के एल्बिनो होने की संभावना होती है। एल्बिनिज्म एक दुर्लभ आनुवंशिक स्थिति है, जिसमें मेलेनिन पिगमेंट का निर्माण नहीं होने के कारण पक्षी का रंग सफेद हो जाता है। ऐसे पक्षियों की आंखें, चोंच और पैर गुलाबी या लाल रंग के हो सकते हैं। कमजोर दृष्टि, शिकारी जीवों द्वारा आसानी से दिखाई देना तथा धूप से होने वाले नुकसान के कारण अधिकांश एल्बिनो पक्षियों का जीवन सामान्य पक्षियों की तुलना में छोटा होता है।
भारत में एल्बिनो बुलबुल की रिपोर्टिंग बेहद कम हुई है। पहली बार 1894 में तत्कालीन बॉम्बे में इसका उल्लेख किया गया था। इसके बाद असम, तमिलनाडु, मणिपुर और बंगाल सहित कुछ स्थानों पर ही ऐसे पक्षियों के रिकॉर्ड मिले। महाराष्ट्र में भी इसकी रिपोर्टिंग बेहद सीमित रही है। वर्ष 2011 में रायगढ़, 2021 में बुलढाणा और फरवरी 2026 में कोंकण में आंशिक एल्बिनो बुलबुल देखी गई थी। अब 26 जुलाई 2026 को वर्धा में पहली बार इस दुर्लभ एल्बिनो बुलबुल का वैज्ञानिक रिकॉर्ड दर्ज किया गया है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, वर्धा जिले के लिए यह खोज जैव विविधता और पक्षी संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
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