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April 19, 2026 3:19 am

बंदूक से विकास की ओर: सुकमा के तुंगल इको-पर्यटन केंद्र की प्रेरक कहानी

रायपुर, 18 अप्रैल 2026। सुकमा जिले में वन विभाग की एक अभिनव पहल ने विकास और पुनर्वास का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है। वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में विकसित तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरा है।

सुकमा नगर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थल पूर्व में उपेक्षित और जर्जर अवस्था में था। वन विभाग द्वारा सुनियोजित विकास कार्यों के माध्यम से इसे एक आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में परिवर्तित किया गया। यहाँ विकसित सुंदर टापू, हरित प्राकृतिक परिवेश और शांत वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहाँ पहुंच रहे हैं।

इस केंद्र की सबसे विशेष पहल तुंगल नेचर कैफे है, जिसका संचालन ‘आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह’ की 10 महिलाएँ कर रही हैं। इनमें पाँच महिलाएँ वे हैं, जिन्होंने नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया है, जबकि अन्य पाँच महिलाएँ नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों से हैं। इन सभी महिलाओं को जगदलपुर और सुकमा के प्रशिक्षण संस्थानों में विशेष प्रशिक्षण प्रदान कर स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाया गया है।

आज ये महिलाएँ आत्मविश्वास के साथ पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं और सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर रही हैं। जो महिलाएँ कभी भय, असुरक्षा और संघर्ष के माहौल में जीने को मजबूर थीं, वे अब आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की मिसाल बन गई हैं। यह परिवर्तन न केवल उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है, बल्कि समाज में भी एक प्रेरक संदेश दे रहा है।

पर्यटन केंद्र की सफलता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 को शुभारंभ के बाद मात्र तीन महीनों में, 30 मार्च 2026 तक यहाँ कुल 8,889 पर्यटक पहुंचे। इस अवधि में केंद्र ने लगभग 2 लाख 92 हजार रुपये की आय अर्जित की है, जो इसकी बढ़ती लोकप्रियता और आर्थिक संभावनाओं को दर्शाता है।

पर्यटक यहाँ स्थानीय व्यंजनों का आनंद लेने के साथ-साथ तुंगल डैम में कयाकिंग, पैडल बोटिंग और बाँस राफ्टिंग जैसी रोमांचक गतिविधियों का अनुभव भी कर रहे हैं। इससे यह केंद्र न केवल पर्यटन बल्कि एडवेंचर गतिविधियों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन गया है।

सही दिशा, अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर जीवन की राह बदली जा सकती है। तुंगल इको-पर्यटन केंद्र न केवल पर्यटन विकास का माध्यम है, बल्कि यह सामाजिक पुनर्वास, महिला सशक्तिकरण और सतत विकास की दिशा में एक प्रभावी कदम है।

बस्तर अंचल की बदलती तस्वीर में यह केंद्र एक उज्ज्वल उदाहरण के रूप में उभर रहा है, जो यह संदेश देता है कि प्रकृति संरक्षण के साथ-साथ मानव विकास को जोड़कर समाज में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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