पीएम का प्रोग्राम और बढ़ गया नंबर
वीवीआईपी प्रवास को लेकर जिम्मेदारी के साथ कितना तनाव रहता है यह जानना और समझना है तो जिले के आला अफसरों से पूछिए। वीवीआईपी प्रवास का मतलब ही अपने आप में चैलेंजिंग होता है,उसमें भी निर्बाध रूप से सम्पन्न कराना मतलब सब-कुछ ओके। या यूं कहें कि एवरीथिंग इज गुड। जी हां कुछ ऐसे ही हुआ बिलासपुर डिस्ट्रिक हेड क्वार्टर में। पीएम मोदी का प्रवास और प्रवास के दौरान जुटी रिकार्ड भीड़। इस पर भी सब-कुछ बेहद शांति के साथ निपट गया। इसमें भी सबसे बड़ी बात ये कि छत्तीसगढ़ में पीएम की सबसे बड़ी सभा का रिकार्ड भी बन गया। इतना सब लिखने और बताने का आशय तो आप समझ ही गए होंगे। पीएम की सफल सभा के लिए किनका-किनका नंबर बढ़ा होगा। एक और दो का तो तय मानकर चलिए। टाप रैंकिंग में तो आना ही था। सो आ ही गए। दौरान शिफ्टिंग का भी चल रहा है। ब्यूरोक्रेट्स में अंदाजा लगाया जा सकता है कि साहब लोगों को अच्छा जिला मिलेगा ही मिलेगा। सवाल पीएम की सफल सभा का था। सो वह तो हो ही गया। अब बारी ईनाम का है। आगे-आगे देखते जाइए होता है क्या।
ये तो बड़ा अचीवमेंट है, होना भी चाहिए

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जो डेडलाइन तय किया है विष्णुदेव की सरकार उसे पूरा करने जोर लगा रही है। नक्सल मूवमेंट पर काफी हद तक अंकुश जो लग रहा है। पहले बस्तर के छह जिले नक्सल इफैक्टेड था। अब सिर्फ तीन जिले ही बचे है। सुरक्षा बलों का जैसा जोर चल रहा है उससे तो यही लग रहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री के डेडलाइन से पहले बस्तर नक्सल मुक्त हो जाएगा और बस्तरवासी शांति के साथ जीवन गुजारेंगे। सुरक्षा बलों का दबाव कहें या फिर राज्य सरकार की पैनी निगाहे और सिकुड़ते नक्सल एरिया के बीच एक बड़ा इंप्रुवमेंट ये कि माओवादियों की ओर से सीज फायर का प्रस्ताव आने लगा है। सीज फायर क्यों अब तो सीधे फायर की बात हो रही है। कहते हैं ना उम्मीद पर दुनिया टिकी है, उम्मीद की जानी चाहिए कि अमित शाह के डेडलाइन से पहले बस्तरवासी उन्मुक्त और खुली हवा में सांस ले सकें और बेफिक्री के साथ जीवन गुजारें। भावी पीढ़ी की बेहतरी तो भी इसी में है।
अब वेटिंग इन मिनिस्टर की होने लगी चर्चा
राज्य सरकार ने निगम मंडल व बोर्ड अध्यक्ष उपाध्यक्षों की नियुक्ति कर दी है। 35 भाजपाइयों को लालबत्ती से नवाज दिया है। राज्य सरकार ने इन भाजपाइयों को नवरात्रि का उपहार दे दिया है। जो लोग संभावनाएं तलाश रहे थे और तलाशते-तलाशते आखिरकार लालबत्ती मिल ही गई,उनकी तो बांछे ही खिल गई है। मानों दसों उगंलियां घी में और …. कहावत की आगे की लाइन जरा खतरनाक है। मुंह उधर ना ले जाइएगा, नहीं तो खतरे ही खतरे हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ में सीबीआई की इंट्री हो चुकी है। एसीबी और ईओडब्ल्यू अपना काम पहले से ही बखूबी कर रही है। सियासत के अलावा और भी जगह है जहां रूतबा के लिए लालबत्ती ठीक है। बहरहाल लालबत्ती वितरण के बाद अब एक बार फिर वेटिंग इन मिनिस्टर को लेकर चर्चा तेज हो गई है। नवरात्रि में जब लालबत्ती का बंटवारा हो सकता है तो फिर दो मंत्री की साय मंत्रिमंडल में इंट्री क्यों नहीं। सियासत में कब क्या हो जाए, ना तो कोई दावे के साथ कह सकता है और ना ही इसी दावे के साथ अअंदाज लगा सकता है। बहरहाल वेटिंग इन मिनिस्टर को लेकर एक बार फिर छत्तीसगढ़ की राजनीति में चर्चा का दौर शुरू हो गया है।
गौरीशंकर को गुस्सा क्यों आया
राज्य सरकार ने लालबत्ती का वितरण कर दिया है। छग राज्य केश शिल्पी कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पदों पर सरकार ने नियुक्ति कर दी है। मोना और गौरीशंकर बोर्ड का जिम्मा संभालेंगे। मोना जहां खुश है वहीं गौरीशंकर को गुस्सा आ गया है। कुछ बातें ऐसी होती है जो छिपाए नहीं छिपता। गौरीशंकर के साथ भी यही हुआ। सोशल मीडिया में अपनी भावनाएं प्रकट कर दी। गौरी ने लिखा भारी भरकम पद के वे लायक नहीं है। इस मासूमियत भरे खुलासे का मतलब समझने वाले अच्छी तरह समझ रहे हैं और इसे बुझने की कोशिश भी कर रहे हैं। सोशल मीडिया में गौरी के गुस्से को लेकर आत पूरे दिन चर्चा भी होते रही और लोग अपने हिसाब से मतलब भी निकालते रहे। सवाल यह भी है कि गौरी के गुस्से का असर किसे होगा और किस हद तक होगा। कहने वाले तो यह भी कानाफूसी कर रहे हैं कि उलटा ना हो जाए और खुद को ही कहीं खामियाजा ना भुगतना पड़ जाए। जितनी मुंह उतनी बातें।
अटकलबाजी
o एक एएसपी पूरे 72 घंटे तक गायब रहे। गायब रहने का राज क्या है। आख़िर एएसपी के अदृश्य होने के पीछे कारण क्या हो सकता है।
o दिग्गजों की तिकड़ी को लालबत्ती मिलने का सियासी मतलब क्या निकाला जा रहा है। मंत्रिमंडल में वापसी की गुंजाइश तो खत्म नहीं हो गई।
प्रधान संपादक


