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September 5, 2026 5:46 pm

डीईओ पर गिरी गाज, स्थापना शाखा के बाबू पर मेहरबानी क्यों?

युक्तियुक्तकरण की जांच में दोहरा मापदंड का आरोप, एक ही दस्तावेज में दोनों की भूमिका होने का दावा; शिक्षा मंत्री से करीबी के रसूख की चर्चा भी गरम

CBN36 बिलासपुर। शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति को लेकर चल रहे विवाद की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं। जांच में तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्हें जिम्मेदार माना गया, लेकिन स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क सुनील यादव की भूमिका को लेकर शिकायतकर्ता की ओर से उठाए गए सवालों पर स्थिति साफ नहीं है। शिकायतकर्ता अंकित गौरहा का दावा है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर टांडे पर जिम्मेदारी तय हुई, उन्हीं दस्तावेजों में सुनील यादव की भूमिका भी सामने आती है। इसके बावजूद उनकी भूमिका की उसी स्तर पर जांच नहीं किए जाने का आरोप है।

एक ही रिकॉर्ड, दो अलग-अलग नतीजे?

शिकायतकर्ता अंकित गौरहा के अनुसार उन्होंने जांच समिति के सामने युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से संबंधित दस्तावेजों का पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत किया था। उनका दावा है कि जांच समिति ने इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर तत्कालीन डीईओ विजय टांडे की भूमिका को दोषपूर्ण माना।

गौरहा का कहना है कि इसी रिकॉर्ड में स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क सुनील यादव की भूमिका से जुड़े तथ्य भी मौजूद हैं। उन्होंने जांच समिति से यादव की भूमिका की भी जांच कराने की मांग की थी। आरोप है कि इसके बावजूद इस पहलू पर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दिया गया।

यहीं से जांच की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है-अगर एक ही दस्तावेज अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने का आधार बन सकता है, तो उसी दस्तावेज में सामने आ रही कर्मचारी की भूमिका की जांच क्यों नहीं?

पहले भी उठा था सवाल, अधिकारी निलंबित, बाबू पर कार्रवाई नहीं

शिकायतकर्ता ने करीब तीन साल पुराने एक मामले का हवाला देकर भी विभागीय कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल के कार्यकाल में एक मामले की जांच हुई थी। गौरहा का दावा है कि उस जांच में सुनील यादव की भूमिका पर भी सवाल उठे थे और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि निलंबन की सिफारिश किए जाने की बात सामने आई थी।

इसके बावजूद शिकायतकर्ता के अनुसार तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल को निलंबित कर दिया गया, जबकि सुनील यादव पर वैसी कार्रवाई नहीं हुई।

गौरहा का आरोप है कि जांच की आंच अधिकारी तक पहुंचती है, लेकिन स्थापना शाखा में बैठे बाबू तक पहुंचने से पहले ही रुक जाती है। यही सवाल अब युक्तियुक्तकरण की मौजूदा जांच में भी उठ रहा है।

150 से 200 शिकायतों का दावा, फिर भी कार्रवाई का इंतजार

शिकायतकर्ता का दावा है कि सुनील यादव के खिलाफ अलग-अलग स्तरों पर करीब 150 से 200 शिकायतें की जा चुकी हैं। इनमें प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण-पदस्थापना और वर्तमान में चल रही विकल्प प्रक्रिया से जुड़े मामले भी शामिल होने की बात कही गई है।

गौरहा के अनुसार शिकायतें कमिश्नर, सचिव, कलेक्टर और मंत्री स्तर तक पहुंचाई गईं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि इतने स्तरों तक शिकायतें पहुंचीं तो उनकी जांच का परिणाम क्या रहा? क्या सभी शिकायतों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हुई?

मंत्री से करीबी की चर्चा, रसूख पर भी सवाल

पूरे मामले में सुनील यादव के शिक्षा मंत्री से करीबी संबंध होने की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि, राजनीतिक पहुंच के कारण कार्रवाई प्रभावित होने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी कथित प्रभाव के चलते यादव लगातार कार्रवाई से बचते रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों पर विभाग और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी है।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यादव पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, बल्कि यह भी है कि क्या जांच समिति ने शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए गए सभी दस्तावेजों और उसमें उल्लिखित प्रत्येक संबंधित व्यक्ति की भूमिका की समान रूप से जांच की?

कलेक्टर के जांच आदेश के बाद भी सवाल

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि हाल ही में कलेक्टर ने सुनील यादव के खिलाफ जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी यादव ने अपनी जगह एक चपरासी को बैठाकर स्थापना शाखा का काम कराया।

इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि आरोप सही पाया जाता है तो यह भी जांच का विषय होगा कि किसी कर्मचारी को अपनी जगह दूसरे कर्मचारी से शाखा का काम कराने की अनुमति किस स्तर से मिली और संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं।

अब विभाग को देना होगा जवाब

मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जांच का पैमाना सभी के लिए एक समान था या नहीं। यदि दस्तावेजों के आधार पर तत्कालीन डीईओ विजय टांडे की जवाबदेही तय की गई है तो उन्हीं दस्तावेजों में दूसरे संबंधित कर्मचारियों की भूमिका पर भी स्पष्ट निष्कर्ष सामने आना चाहिए।

शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने जांच समिति के सामने पूरे तथ्य और दस्तावेज रखे थे। अब उनकी मांग है कि दस्तावेजों में जिन-जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है, उन सभी की समान मापदंड पर निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने पर जिम्मेदारी तय की जाए।यही वह बिंदु है जिस पर अब शिक्षा विभाग की जांच प्रक्रिया और उसकी निष्पक्षता दोनों की अग्निपरीक्षा है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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