“जंगल में कैंप, ग्रामीणों का भरोसा और सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी बनी रणनीति की ताकत; 2011-13 में SP रहते गर्ग ने तैयार की थी दीर्घकालिक योजना”
CBN 36 छत्तीसगढ़ । कभी नक्सलियों की दहशत से कांपने वाले बस्तर में आज हालात बदल चुके हैं। जंगलों में सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी है, गांवों में भरोसा लौटा है और नक्सलियों का प्रभाव लगातार सिमटा है। इस बदलाव के पीछे कई वर्षों का अभियान और रणनीति रही है। इसी रणनीति की एक अहम कड़ी गरियाबंद में तत्कालीन एसपी आईपीएस रामगोपाल गर्ग की वह योजना थी, जिसने आगे चलकर प्रदेश के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती की रणनीति को नई दिशा दी।

बिलासपुर रेंज के आईजी रामगोपाल गर्ग को इसी उल्लेखनीय सेवा के लिए सराहनीय सेवा पदक से सम्मानित किया जाएगा।
जब नक्सलियों का दबदबा था, तब तैयार हुई थी योजना
रामगोपाल गर्ग वर्ष 2011 से 2013 तक गरियाबंद के एसपी रहे। उस समय जिले के कई हिस्सों में नक्सलियों की सक्रियता चरम पर थी। जंगलों में उनकी आवाजाही और गांवों में दखल लगातार बढ़ रही थी।
गरियाबंद में पदस्थापना का आदेश मिलते ही गर्ग ने तय कर लिया था कि नक्सल समस्या से निपटने के लिए केवल पुलिस अभियान पर्याप्त नहीं होगा। नक्सलियों को जंगल में ही चुनौती देनी होगी और सुरक्षा बलों की मौजूदगी उन इलाकों तक पहुंचानी होगी, जहां अब तक उनकी पहुंच सीमित थी।इसी सोच से एक दीर्घकालिक योजना तैयार की गई।
जंगल के अंदर कैंप बनाना बना गेमचेंजर
गर्ग की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा था दुर्गम और नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित करना। गरियाबंद में उन्होंने चार ऐसे कैंप खुलवाए, जिनसे सुरक्षा बलों की जंगल के भीतर पहुंच मजबूत हुई।
इसका असर सीधे नक्सलियों की गतिविधियों पर पड़ा। जिन इलाकों में पहले नक्सली बेखौफ घूमते थे, वहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ने लगी। उनकी आवाजाही पर अंकुश लगने लगा और जंगलों में उनका दबदबा कमजोर पड़ने लगा।
हथियार से पहले जीता ग्रामीणों का भरोसा
नक्सल विरोधी अभियान में गर्ग ने एक और अहम बात पर जोर दिया-ग्रामीणों का भरोसा जीतना।सुरक्षा बलों के कैंप गांवों के करीब पहुंचे तो ग्रामीणों को सुरक्षा का एहसास हुआ। पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच दूरी कम हुई। ग्रामीणों का भरोसा बढ़ा तो नक्सलियों के लिए गांवों में अपनी पकड़ बनाए रखना मुश्किल होने लगा।यही भरोसा आगे चलकर सुरक्षा बलों के लिए नक्सलियों के खिलाफ अभियान में बड़ी ताकत बना।
गरियाबंद से निकला मॉडल, बस्तर तक पहुंचा
गरियाबंद में इस रणनीति के परिणाम सामने आने के बाद दूरस्थ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई। केंद्र और राज्य स्तर पर इस दिशा में योजनाएं आगे बढ़ीं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी इस मॉडल को गंभीरता से लिया और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के कैंप बढ़ाने की रणनीति को आगे बढ़ाया।
इसके बाद बस्तर के घने जंगलों और दुर्गम इलाकों तक सुरक्षा बलों की पहुंच लगातार बढ़ती गई। नए कैंप खुले, अभियान तेज हुए और नक्सलियों के सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ता गया।
दो दशक की सोच ने बदली लड़ाई की तस्वीर
गर्ग की रणनीति तत्काल कार्रवाई तक सीमित नहीं थी। उन्होंने लंबी अवधि के लिए योजना बनाई थी। मकसद था कि सुरक्षा बल केवल ऑपरेशन के दौरान जंगल में न जाएं, बल्कि वहां अपनी स्थायी मौजूदगी बनाएं।यही रणनीति आगे चलकर नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती का महत्वपूर्ण आधार बनी। जंगल के भीतर लगातार बढ़ती सुरक्षा मौजूदगी ने नक्सलियों की आवाजाही, नेटवर्क और प्रभाव को लगातार कमजोर किया।
आज बस्तर में दिख रहा बदलाव
जिस बस्तर में कभी नक्सलियों की समानांतर सत्ता और दहशत की चर्चा होती थी, वहां अब तस्वीर बदल रही है। गांवों में सामान्य गतिविधियां बढ़ी हैं और सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने लोगों में भरोसा मजबूत किया है।इस बदलाव की कहानी में गरियाबंद से शुरू हुई रणनीति का अध्याय भी खास है।
सेवा पदक से होगा सम्मान
नक्सलवाद के खिलाफ इसी रणनीतिक सोच और उल्लेखनीय सेवा के लिए बिलासपुर रेंज के आईजी रामगोपाल गर्ग को सराहनीय सेवा पदक से सम्मानित किया जाएगा।गरियाबंद में एसपी रहते जिस योजना को उन्होंने जमीन पर उतारा था, वह आगे चलकर प्रदेश के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ाने की बड़ी रणनीति बनी। ऐसे में यह सम्मान गर्ग की सेवा के साथ-साथ नक्सल विरोधी अभियान में उनकी दूरदर्शी रणनीति की भी पहचान माना जा रहा है।
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