‘हमर पहुना’ में महर्षि यूनिवर्सिटी के कुलपति ने साझा किया संघर्ष से सफलता तक का सफर, बोले- शिक्षा ने बदली जिंदगी
CBN36 बिलासपुर। पिता का छह साल की उम्र में निधन हो गया। मां ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, परिवार चलाने के लिए मजदूरी करती थीं। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। मां के साथ डॉ. नरेश तिवारी ने भी बाल अवस्था से मजदूरी करते हुए पढ़ाई जारी रखी। कक्षा छठवीं से पीएचडी तक शासन की छात्रवृत्ति मिली और इसी के सहारे उन्होंने उच्च शिक्षा का सफर पूरा किया। आज वह महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (MUMT), बिलासपुर के कुलपति हैं।
रविवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के परंपरागत कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में डॉ. तिवारी ने पत्रकारों से बातचीत में अपने संघर्ष, वैज्ञानिक जीवन, शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्य और विश्वविद्यालय की भावी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया।
डॉ. हरिसिंह गौर की पहल को बताया शिक्षा यात्रा का आधार
डॉ. तिवारी ने बताया कि उनका जन्म बुंदेलखंड के सागर जिले में हुआ। सागर में डॉ. हरिसिंह गौर द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय उनकी शिक्षा यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। उन्होंने कहा कि डॉ. गौर ने अपनी निजी कमाई से विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की होती तो शायद उनकी शिक्षा भी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती। उन्होंने डॉ. गौर को नमन करते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति की परिस्थितियों को बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है।
पिता के निधन के बाद मां ने मजदूरी कर परिवार संभाला। उन्होंने खुद भी पढ़ाई के साथ मजदूरी की। कक्षा छठवीं से पीएचडी तक शासन की छात्रवृत्ति मिली। एमटेक के बाद रिमोट सेंसिंग में पीएचडी की और मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया।
बिलासपुर के गांव-गांव पहुंचकर किया भौगोलिक अध्ययन
वैज्ञानिक के रूप में डॉ. तिवारी का छत्तीसगढ़ से भी गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने बिलासपुर जिले की भौगोलिक संरचना और भूगोल का अध्ययन किया और जिले के गांव-गांव तक पहुंचे। कोरबा में खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन किया। खनन के बाद पर्यावरण पर पड़े असर के साथ कंपनियों की ओर से किए गए पौधरोपण और अन्य उपचारात्मक कार्यों की प्रभावशीलता का भी आकलन किया। जबलपुर और बस्तर में खनिज अन्वेषण से जुड़े कार्यों में भी योगदान दिया।
वैज्ञानिक के रूप में पुरस्कार और उपलब्धियां मिलने के बावजूद उनके मन में यह सवाल बना रहा कि उनके जाने के बाद उनके काम को आगे कौन बढ़ाएगा। इसी सोच ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया।
नियमों से समझौता नहीं किया, 238 विद्यार्थियों को किया डिटेन
वर्ष 2003 में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विभाजन के बाद उन्हें सी.वी. रमन विश्वविद्यालय में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। करीब दो वर्ष प्राध्यापक के रूप में काम करते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा व्यवस्था को करीब से समझा। वर्ष 2008 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हो गए।
इसके बाद ओरिएंटल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स और बंसल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने विद्यार्थियों की कम उपस्थिति को उच्च शिक्षा के सामने बड़ी चुनौती बताया। एक संस्थान में कम उपस्थिति वाले 238 विद्यार्थियों को नियमों के तहत डिटेन करने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि दबाव के बावजूद नियमों से समझौता नहीं किया गया। बाद में विद्यार्थियों की उपस्थिति और अनुशासन में बदलाव देखने को मिला।
डॉ. तिवारी के अनुसार ओरिएंटल विश्वविद्यालय, श्याम बिहारी विश्वविद्यालय, मध्य छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय, श्रीकृष्ण विश्वविद्यालय और आर्या विश्वविद्यालय की स्थापना में उन्होंने संस्थापक सलाहकार के रूप में योगदान दिया। इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय और छविंद्र विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में भी काम किया।
छह माह में 13 संस्थाओं से एमओयू, यूके में दो पेटेंट
महर्षि यूनिवर्सिटी में कुलपति के रूप में करीब छह माह के कार्यकाल की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि अब तक 13 संस्थाओं के साथ एमओयू किए गए हैं। इनमें बीएनआई, जनजातीय अनुसंधान एवं विज्ञान केंद्र नई दिल्ली और क्षेत्र के विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन संस्थाओं के साथ नवाचार, अनुसंधान और जनजातीय समाज से जुड़े विषयों पर काम किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय से जुड़े दो पेटेंट यूके में पंजीकृत हुए हैं। इनमें एक कंप्यूटर डिवाइस और दूसरा एआई आधारित डिवाइस है। इनके उपयोग और आगे के अनुसंधान पर काम चल रहा है। विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने 30 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं, जबकि 13 से अधिक पुस्तक अध्याय और पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने पर जोर
डॉ. तिवारी ने कहा कि महर्षि विश्वविद्यालय आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को भी आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। योग, वेद, ध्यान और भारतीय मूल्यों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महर्षि महेश योगी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को दुनिया के 117 देशों तक पहुंचाया और विश्वविद्यालय भी इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
कार्यक्रम में पत्रकारों ने डॉ. तिवारी से उनके वैज्ञानिक जीवन, उच्च शिक्षा की चुनौतियों, विश्वविद्यालय प्रशासन और भविष्य की योजनाओं से जुड़े सवाल पूछे। उन्होंने सभी सवालों के जवाब देते हुए अपने अनुभव साझा किए।
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