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August 13, 2026 8:04 pm

एमएसएमई तंत्र को मजबूत करने के लिए सुधारों का अगला चरण

(जीतन राम मांझी)

CBN36 छत्तीसगढ़ ।संसद के दोनों सदनों द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 का पारित होना, एमएसएमई के लिए भारत के कानूनी ढांचे को तेज़ी से बदलते तंत्र के अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मूल अधिनियम के बाद से पिछले दो दशकों में, लाखों उद्यम औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बने हैं और एमएसएमई राष्ट्रीय विकास, निर्यात और रोज़गार सृजन में अहम योगदान देने वाले बन गए हैं। इस संशोधन का उद्देश्य एमएसएमई इकोसिस्टम को ज़्यादा संवेदनशील और भरोसे पर आधारित बनाना है। इससे पंजीकरण आसान होगा,  वर्गीकरण बेहतर होगा, ऋण तक पहुंच और समय पर भुगतान आसान होगा, विवादों का निपटारा डिजिटल और तेज़ होगा और नियमों का पालन आसान होगा।

इस संशोधन में उद्यमों के मुफ्त और स्वैच्छिक पंजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रावधान किया गया है। इससे कई तरह की बाधाएं दूर होंगी और सरकार को बेहतर तरीके से लाभ पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। अधिनियम के तहत पंजीकरण एक पात्रता है, जिसका दावा कोई भी कंपनी कर सकती है, यह कोई बाध्यता नहीं है।

यह संशोधन संयंत्र, मशीनरी या उपकरणों में निवेश और कारोबार के संयुक्त मानदंडों के आधार पर उद्यमों के वर्गीकरण के लिए एक स्पष्ट फ्रेमवर्क प्रदान करता है। इस वर्गीकरण से  फ्रेमवर्क  को प्रौद्योगिकी, लागत, बाजार और व्यवसाय मॉडल में आने वाले बदलावों के अनुसार तेज़ी से ढाला सकता है और यह केंद्र सरकार को अधिसूचना के माध्यम से इसकी सीमाओं को निर्धारित करने का अधिकार देता है।

ज़्यादातर एमएसएमई के लिए सबसे बड़ी चिंता नियमित नकद प्रवाह की होती है, क्योंकि किसी छोटे उद्यम का एक भी भुगतान न मिलने का व्यापक असर कर्मचारियों के समय पर वेतन, कच्चे माल की खरीद और अगले ऑर्डर को स्वीकार करने पर पड़ता है, जिससे  भुगतान में देरी होने से कंपनी के काम करने और आगे बढ़ने की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए इस संशोधन में इस समस्या को तीन चरणों – रोकथाम, समाधान और कार्यान्वयन के माध्यम से दूर करने की कोशिश की गई है।

रोकथाम: यह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के लिए ‘ट्रेड्स’ (टीआरइडीएस) के माध्यम से एमएसएमई से संबंधित रसीद (इनवॉइस) के भुगतान और जानकारी देने को अनिवार्य बनाकर पारदर्शिता लाता है। राज्य सरकारें भी यही नियम अपने राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर लागू कर सकती हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित एक डिजिटल प्लेटफॉर्म होने के नाते, ‘ट्रेड्स’ एक स्वीकृत इनवॉइस के आधार पर बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से तुरंत वित्तपोषण प्राप्त करने की सुविधा देता है। इससे आपूर्तिकर्ता को अग्रिम भुगतान मिल जाता है, जबकि खरीदार तय तिथि पर बैंक या वित्तीय संस्थान को भुगतान चुकता करता है। इस प्रकार, रिसिवेबल्स (मिलने वाली रकम) आपूर्तिकर्ता के लिए लिक्विडिटी का ज़रिया बन जाता है, जिससे कंपनी को अपने कामकाज का प्रबंधन करने, बिलों का भुगतान करने और व्यवसाय को आगे बढ़ाने में आसानी होती है।

समाधान: यह इस अधिनियम के विवाद-समाधान फ्रेमवर्क को और अधिक मजबूत करता है। यह राज्य सरकारों को मध्यस्थता और सुलह के लिए अतिरिक्त ‘सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषदों’ (एमएसइएफसी) की स्थापना करने में सक्षम बनाता है। यह मध्यस्थता और सुलह के लिए समय-सीमा निर्धारित करता है तथा ऑनलाइन विवाद-समाधान को वैधानिक मान्यता प्रदान करता है। इससे मामलों का तेजी से निपटारा होगा और एक ऐसी व्यवस्था तैयार होगी जिससे कंपनी प्रक्रिया और समय-सीमा की निश्चितता के साथ अपने जायज़ दावों को पेश कर सकेगी।

कार्यान्वयन: ‘सुविधा परिषदों’ द्वारा दिए गए निर्णय के तहत मिलने वाली रकम को ज़मीन के लगान की बकाया राशि की तरह वसूला जा सकता है। यदि कोई खरीदार किसी फैसले को अदालत में चुनौती देना चाहता है, तो उसे तय राशि का 75 प्रतिशत अदालत में जमा कराना होगा और यदि वह चुनौती छह महीने तक लंबित रहती है, तो अदालत उस जमा राशि में से आधी राशि आपूर्तिकर्ता को जारी कर सकती है। इस प्रकार, लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी के कारण जायज दावों को खारिज नहीं किया जा सकेगा और अदालत में बीतने वाला समय अब केवल खरीदार के पक्ष में नहीं होगा।

यह संशोधन उद्यमों के लिए अनुपालन के प्रति अधिक संतुलित और विश्वास-आधारित दृष्टिकोण की दिशा में बदलाव को भी दर्शाता है। छोटे-मोटे उल्लंघन के लिए अब पहली बार में केवल चेतावनी दी जाएगी और अपराध दोहराए जाने पर अलग-अलग आर्थिक जुर्माने लगाए जा सकते हैं। नियमों के पालन की प्रक्रिया को ज़्यादा अनुमान लगाने लायक और आसान बनाकर,  कंपनियाँ अब अपनी ऊर्जा अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने पर लगा सकती हैं। इससे व्यवसाय करने में सुगमता (ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस) और विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा मिलेगा।

आखिर में, यह संशोधन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में विश्वास का एक प्रतीक है, जो उन्हें नवाचार करने, रोज़गार पैदा करने, नए बाज़ारों में प्रवेश करने और अधिक प्रतिस्पर्धी बनने में सक्षम बनाएगा। एक अधिक मजबूत और गतिशील एमएसएमई क्षेत्र ‘विकसित भारत’ के लक्ष्यों को प्राप्त करने में अहम भूमिका निभाएगा।

(लेखक केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री हैं)

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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