बिलासपुर। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने पोषण और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए चावल की सात नई उन्नत किस्में विकसित की हैं। ‘डिजाइनर राइस’ के नाम से पहचानी जा रही इन किस्मों में विटामिन-ए, आयरन, जिंक और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों के साथ कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (लो-जीआई) जैसे गुण शामिल किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये किस्में कुपोषण, रतौंधी और मधुमेह जैसी स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में सहायक साबित हो सकती हैं।
आईसीएआर द्वारा विकसित नई किस्मों में गोल्डन राइस सबसे अधिक चर्चा में है। बीटा-कैरोटीन से भरपूर यह चावल शरीर में विटामिन-ए की कमी दूर करने में मदद करता है, जिससे रतौंधी जैसी बीमारी की रोकथाम संभव मानी जा रही है। वहीं आयरन और जिंक से समृद्ध किस्में एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने में उपयोगी बताई जा रही हैं।
मधुमेह रोगियों के लिए लो-जीआई राइस
नई किस्मों में शामिल लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स (लो-जीआई) राइस विशेष रूप से मधुमेह रोगियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसका सेवन करने पर रक्त में शर्करा का स्तर सामान्य चावल की तुलना में धीरे-धीरे बढ़ता है। इसके अलावा हाई-प्रोटीन राइस बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कुपोषित लोगों के पोषण की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
लाल और काले चावल (रेड एवं ब्लैक राइस) में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ब्लैक राइस हृदय स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी लाभकारी माना जाता है। वहीं फोर्टीफाइड राइस में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन-बी2 जैसे पोषक तत्वों का समावेश किया गया है।
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक किस्मों में भी संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक सुगंधित धान किस्मों—दुबराज, विष्णुभोग, जीराफूल और नागकेसर—में वैज्ञानिक तरीके से आयरन, जिंक, प्रोटीन और लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स जैसे गुण विकसित किए जाएं, तो राज्य पोषणयुक्त प्रीमियम चावल के उत्पादन में राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना सकता है।
‘पोषण सुरक्षा का भविष्य है डिजाइनर राइस’
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के एग्रोनॉमी विभाग के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. एस.आर. पटेल ने कहा कि डिजाइनर राइस केवल अधिक उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि भविष्य की पोषण सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। उनके अनुसार पारंपरिक सुगंधित धान किस्मों में बायोफोर्टिफिकेशन और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स जैसे गुणों का समावेश कर उन्हें वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्यवर्धक और प्रीमियम चावल के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी, उपभोक्ताओं को बेहतर पोषण मिलेगा और छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान भी मजबूत होगी।
प्रधान संपादक


