वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में सोमवार को कबीरदास जयंती के अवसर पर ‘कबीरदास का समग्र अवदान’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. पूरनचंद टंडन ने कहा कि कबीरदास ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों पर प्रहार किया तथा उनकी दृष्टि में समग्रता के साथ समन्वय का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
महादेवी वर्मा सभागार में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. टंडन ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि कबीर विशुद्ध अद्वैतवादी साधक थे। उनके विचारों में आत्मसमर्पण और आत्मविलय का भाव था, जिसे उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से समाज तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि कबीर का काव्य प्रेम, चिंतन, निष्पक्ष चेतना और आध्यात्मिक शक्ति से ओतप्रोत है।
उन्होंने कहा कि ललित कला, वास्तुकला, चित्रकला और गायन जैसी कलाओं से कबीर का जीवन समृद्ध था। उनके जीवन-दर्शन पर नाटक, कविता, कहानी, उपन्यास और धारावाहिकों की रचना हुई है। उनके दोहों के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होने से उन्हें वैश्विक पहचान मिली। आज कबीर पंथ और विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्थापित कबीर केंद्रों के माध्यम से उनके विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है। उन्होंने कबीर की उलटबांसियों और पारिभाषिक शब्दावली पर भी विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि उनके साहित्य में ज्ञान, भक्ति और कर्म का अद्भुत समन्वय है तथा वह आचरण प्रधान नीति साहित्य भी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं स्वागत वक्तव्य में हिंदी साहित्य विभाग के अध्यक्ष प्रो. अवधेश कुमार ने कबीर के दोहों और साखियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि कबीर केवल समाज सुधारक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संघर्ष करने वाले साधक थे। वे मानव मात्र की एकता के प्रतीक हैं।
कार्यक्रम का संचालन सहायक प्रोफेसर डॉ. रूपेश कुमार सिंह ने किया तथा आभार सहायक प्रोफेसर डॉ. कोमल कुमार परदेशी ने व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, कबीरदास के चित्र पर माल्यार्पण और विश्वविद्यालय के कुलगीत के गायन से हुआ, जबकि समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।
इस अवसर पर डॉ. अशोकनाथ त्रिपाठी, डॉ. सूर्यप्रकाश पाण्डेय, डॉ. जगदीश नारायण तिवारी, डॉ. संदीप सपकाले, डॉ. मीरा निचळे, डॉ. शैलेश कदम सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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