बिलासपुर ।दुबई और सऊदी अरब से कमाकर लाए गए सोने-चांदी के जेवरों को बहन के पास सुरक्षित रखवाने से जुड़े एक पारिवारिक विवाद में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। एकादश अपर सत्र न्यायाधीश विजेन्द्र सोनवानी की कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि किसी को केवल अपनी अमानत सौंप देने मात्र से आपराधिक न्यास भंग का मामला नहीं बन जाता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने उस संपत्ति का बेईमानी की नीयत से दुरुपयोग या गबन किया है।
ये है पूरा मामला
यह विवाद सिरगिट्टी क्षेत्र के एक ही परिवार के भाई-बहनों के बीच का है। याचिकाकर्ता भाई जोगी अप्पल कोंडा और जोगी वेंकटरमन ने अपनी बहन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उनके मुताबिक, उनका भाई साल 1992 से 2008 के बीच दुबई और सऊदी अरब में नौकरी करता था। वहां से वह जो भी सोने-चांदी के आभूषण लाता था, उन्हें अपनी मां जोगी सावित्री के पास जमा कर देता था।
मां ने उन जेवरों को सफेद कपड़े की एक पोटली में बांधकर अलमारी में सुरक्षित रखा था। बाद में मां ने वही पोटली अपनी बेटी ए. कृष्णा वेणी उर्फ जोगी सुशीला के पास रखवा दी। भाइयों का आरोप था कि मां की मृत्यु हो जाने के बाद जब उन्होंने बहन से वह पोटली वापस मांगी, तो बहन ने ऐसी किसी भी अमानत के पास होने से साफ इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
जिला सत्र न्यायालय ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले एस.डब्ल्यू. पलानीतकर बनाम बिहार राज्य’** का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 के तहत अपराध तभी माना जाएगा, जब संपत्ति सौंपने के साथ-साथ उसके बेईमानी से इस्तेमाल या गबन के स्पष्ट और पुख्ता सबूत हों।
इसलिए खारिज हुई याचिका
अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि भाइयों की तरफ से ऐसा कोई भी प्राथमिक साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि बहन ने उस सोने का बेईमानी से दुरुपयोग किया है। केवल यह कह देना कि बहन जेवर होने से इनकार कर रही है, आपराधिक मामला चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा भाइयों के परिवाद को निरस्त करने के आदेश को पूरी तरह सही माना और उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
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