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May 27, 2026 1:13 am

 लोकमाटी के शब्द-शिल्पी- डॉ. बलदेव साव का साहित्यिक युगचेतना

सुशीला साहू लेखिका

छत्तीसगढ़।डॉ. बलदेव साव की रचनाएँ अपने समय की नब्ज को पहचानने वाली सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ हैं । उनमें निहित युगबोध सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय परिवर्तनों का संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करती है । साव जी ने अपने लेखन के माध्यम से बदलते मूल्यों, संघर्षों और जनजीवन की जटिलताओं को गहराई से उकेरा है। उनकी कृतियाँ केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के प्रति जागरूक दृष्टि और उत्तरदायित्व का भी परिचय देती हैं । इस प्रस्तावना का उद्देश्य उनके साहित्य में निहित युगबोध के विविध आयामों को समझना और उनके रचनात्मक महत्व को रेखांकित करना है । भारतीय साहित्य की विशाल परंपरा में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं, जिनकी लेखनी केवल शब्दों का विन्यास नहीं करती, बल्कि समाज की धड़कनों को स्वर देती है । डॉ. बलदेव साव ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोकजीवन, संस्कृति, संघर्ष, मानवीय संवेदना और समयबोध को अभिव्यक्ति प्रदान की । उनका साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ का दर्पण और जनचेतना का दस्तावेज है ।

कवि कथाकार एवं कला समीक्षक डॉ बलदेव साव लोककला संस्कृति व साहित्य की नगरी रायगढ़ के एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं । सरल हृदय व सहज व्यक्तित्व के धनी डॉक्टर बलदेव का जन्म 27 मई 1942 को जांजगीर चांपा जिले के नरियरा गांव में हुआ था । गांव नरियरा जहाँ की माटी से वे अंकुरित, पल्लवित व पुष्पित हुए । वह रायगढ़ से बिलासपुर रेल मार्ग पर अकलतरा नामक एक स्टेशन के निकट है । यह अकलतरा जांजगीर चांपा जिले का एक विकासखंड है । किन्तु शिक्षा विभाग में नौकरी हेतु डॉ बलदेव रायगढ़ आये तो परिवार सहित लगभग चार दशकों से वे यहीं के होकर रह गए थे ।  27 मई को उनकी जन्मतिथि केवल एक साहित्यकार के जन्म का स्मरण नहीं, बल्कि उस विचारधारा को नमन करने का अवसर है, जिसने लोकमाटी की सुगंध को साहित्यिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया । डॉ. बलदेव साव का साहित्य हमें यह सिखाता है कि सच्चा साहित्य वही है, जो समाज के दुःख-सुख, संघर्ष और सपनों को आत्मसात कर सके ।

लोकजीवन के सजग साहित्यकार, एक रचनाकार की दृष्टि में अपनी नदी, अपने पहाड़, अपने जंगल आदि सभी कुछ से ठीक उसी तरह संवाद करता और उनसे अटखेलियाँ  करते हुए जीता है, जिस तरह से वह अपने आस-पास के कण-कण से घुल-मिलकर जीता है । डॉ बलदेव साव पर सौ आना सच यह वाक्य खरा उतरता है । केलो नदी से बतियाते हुए कवि कहते हैं-

अरी ! वो केलो 

मुझे अपनी बाह में ले लो 

कब तक खेलती रहेगी 

बेजान पत्थरों से 

उन्हें हटाओ 

मुझसे खेलो 

अरी ! ओ केलो 

तुम वही 

बुढ़ा गया मैं अवश 

लो बाहों में ले लो 

डॉ. बलदेव साव अपनी कविता “जाते-जाते” में मनुष्य और प्रकृति के आत्मीय संबंध को व्यक्त करना चाहते हैं । यहाँ “केलो” नदी का मानवीकरण किया गया है । कवि नदी से आग्रह करता है कि वह उसे अपनी बाहों में समेट ले, क्योंकि अब वह जीवन की थकान और अकेलेपन से अवश हो चुका है । “बेजान पत्थरों” का अर्थ जीवन की निष्ठुरता और संवेदनहीनता से है । कवि चाहता है कि प्रकृति उसे अपनापन, शांति और सहारा दे । इस कविता में जीवन की पीड़ा, प्रकृति के प्रति प्रेम और अंतिम समय में आत्मिक शरण पाने की गहरी भावना व्यक्त हुई । अर्थात मानव को निरंतर सृजन, विकास और प्रगति करते रहना चाहिए ताकि जीवन और ऊर्जा बनी रहे । इन पंक्तियों में प्रकृति का महत्व, और सृजन की प्रेरणा व्यक्त की गई है । 

  डॉ. बलदेव साव की काव्य सोच अत्यंत संवेदनशील, मानवीय और जीवन के यथार्थ से जुड़ी हुई है । वे साधारण शब्दों में गहरे भाव और दर्शन को व्यक्त करने वाले कवि हैं । उनकी कविताओं में प्रकृति, मनुष्य, रिश्ते, संघर्ष, अकेलापन और जीवन की क्षणभंगुरता का सजीव चित्रण मिलता है । कवि मानव जीवन को प्रकृति के साथ जोड़कर देखता है तथा अस्तित्व के छोटे-छोटे अनुभवों में बड़े सत्य खोजता है । उनकी सोच करुणा, आत्मीयता और सामाजिक चेतना से भरी हुई है । वे पाठकों को जीवन के वास्तविक अर्थ, समय की नश्वरता और मानवीय संबंधों की महत्ता का बोध कराते हैं । एक कविता —

होना न होना

मेरा होना 

सूरज का उगना है

न होना 

याने डूब जाना है

मेरा आना 

अपनों को याद करना है

मेरा जाना 

सबको भूल जाना है ।

डॉ. बलदेव साव की कविता “होना न होना” जीवन और अस्तित्व के गहरे सत्य को सरल शब्दों में व्यक्त करती है । कवि “होना” को सूरज के उगने की तरह आशा, प्रकाश और जीवंतता का प्रतीक मानते हैं, जबकि “न होना” डूबते सूरज की तरह अंत और विस्मृति का संकेत है। “मेरा आना” अपनों के प्रेम, स्मृतियों और रिश्तों से जुड़ाव को दर्शाता है, वहीं “मेरा जाना” संसार द्वारा धीरे-धीरे भुला दिए जाने की सच्चाई को प्रकट करता है। कविता जीवन की क्षणभंगुरता, मानवीय संबंधों और अस्तित्व की संवेदनशील अनुभूति को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है ।

रायगढ़ कला संस्कृति और साहित्य के लिए अग्रणी माना जाता है कला की बात करें तो सत्य कला में कत्यक का नाम जो राजा चकचर सिंह के कारण जाना जाता है। रायगर कत्थक घराना को लेकर डॉ. बलदेव ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है। जिसका वर्णन उनकी पुस्तक रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव में  है जो हमें साहित्य संस्कृति का दर्शन कराती है । इस तरह डॉ बलदेव साव की रचनाओं में कविताओं में समकालीन युगबोध तथा प्रगतिशील युगबोध से संबंधित मानी जा सकती है । डॉ. बलदेव साव का साहित्य लोकजीवन की सहजता और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण है । उन्होंने ग्रामीण परिवेश, श्रमशील जीवन, सामाजिक विषमताओं और मानवीय मूल्यों को अत्यंत सरल किन्तु प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया । उनकी रचनाओं में कृत्रिमता नहीं, बल्कि मिट्टी की सोंधी गंध और जनजीवन की सच्चाई दिखाई देती है ।

उनकी लेखनी में गाँव की पगडंडियाँ, खेत-खलिहान, मेहनतकश लोगों का संघर्ष, पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा और बदलते समय की पीड़ा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है । यही कारण है कि उनका साहित्य पाठकों के हृदय को सीधे स्पर्श करता है । डॉ. बलदेव साव ने साहित्य को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज की चेतना से जोड़ा । वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य केवल सौंदर्यबोध उत्पन्न करना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी है ।

युगबोध और सामाजिक चेतना

डॉ. बलदेव साव की रचनाओं में युगबोध अत्यंत सशक्त रूप में उपस्थित है । उन्होंने अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को गहराई से समझा और उन्हें साहित्य में अभिव्यक्त किया । उनकी लेखनी में समाज के शोषित, वंचित और उपेक्षित वर्ग की आवाज सुनाई देती है । उन्होंने सामाजिक असमानता, नैतिक पतन, मानवीय संवेदनहीनता और बदलती जीवनशैली पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया । उनकी रचनाएँ यह संकेत देती हैं कि आधुनिकता के इस दौर में यदि मनुष्य अपने मूल्यों और संस्कारों से दूर हो जाएगा, तो समाज की आत्मा कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए उनका साहित्य मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक समरसता की स्थापना का संदेश देता है ।

भाषा और शैली की विशिष्टता

डॉ. बलदेव साव की भाषा सरल, सहज और प्रभावपूर्ण है । उन्होंने लोकभाषा और जनभाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की । उनकी शैली में भावात्मकता के साथ-साथ विचारों की गहराई भी दिखाई देती है । उनकी रचनाओं का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे पाठकों को बोझिल नहीं लगतीं, बल्कि आत्मीय संवाद का अनुभव कराती हैं । वे कठिन विषयों को भी सरल शब्दों में प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता रखते थे । उनके साहित्य में लोकसंस्कृति, लोकपरंपरा और जनभावनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है । यही कारण है कि उनका साहित्य केवल एक क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा ।

साहित्य और समाज के बीच सेतु-

डॉ. बलदेव साव ने साहित्य को समाज परिवर्तन का माध्यम माना । उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से शिक्षा, संस्कार, सामाजिक एकता और मानवीय सहअस्तित्व का संदेश दिया । उनकी रचनाओं में व्यक्ति और समाज के बीच संबंधों की गहरी समझ दिखाई देती है । वे मानते थे कि साहित्यकार केवल दर्शक नहीं होता, बल्कि समाज का मार्गदर्शक भी होता है । उनकी लेखनी में करुणा है, संवेदना है, संघर्ष है और भविष्य के प्रति आशा भी है । यही विशेषताएँ उन्हें समकालीन साहित्यकारों से अलग पहचान प्रदान करती हैं ।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज के समय में जब साहित्य बाज़ारवाद और तात्कालिक लोकप्रियता की ओर बढ़ रहा है, तब डॉ. बलदेव साव का साहित्य नई पीढ़ी को सृजन की वास्तविक दिशा प्रदान करता है । उनका जीवन और लेखन यह प्रेरणा देता है कि साहित्य का उद्देश्य केवल प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और मानवता के प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी है ।

नई पीढ़ी के शोधार्थियों और साहित्यकारों के लिए उनका साहित्य अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि उसमें लोकजीवन, संस्कृति, युगबोध और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय मिलता है । डॉ. बलदेव साव हिंदी साहित्य के ऐसे साहित्यकार हैं, जिनकी लेखनी में लोकजीवन की आत्मा बसती है । उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को विचार, संवेदना और मानवीय मूल्यों का संदेश दिया । उनकी जन्मतिथि 27 मई हमें यह स्मरण कराती है कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज की चेतना का प्रकाश है । डॉ. बलदेव साव का साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, अध्ययन और मार्गदर्शन का स्रोत बना रहेगा । उनका व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय साहित्य में सदैव सम्मान और आदर के साथ स्मरण किया जाएगा ।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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