निशीथ राय
वैलेंटाइन डे पर विशेष
जो व्यक्ति प्रेम कर सकता है, वह सब कुछ कर सकता है। किसी को देखना, चाहना और जाति, धर्म, संस्कृति और देश की सीमाओं को पार कर उसे राजी करना और फिर निभाना। क्या यह आसान है? इसके लिए जिगर चाहिए । अपने आपको खत्म करने का जिगर । संत कबीर ने ठीक ही लिखा है प्रेम गली अति सांकरी, जामे दो न समाहिं। पर सवाल यह है कि जब दो समा भी जाएं, तो उस गली में टिके कैसे रहें?
प्रेम विवाह के जोड़ों में आपको कुछ अलग मिलेगा। वे या तो शुरुआती कुछ वर्षों में बर्बाद हो जाते हैं, या फिर बेहद परिपूर्ण जीवन जीते हैं। ऐसा इसलिए कि विवाह पूर्व जो खूबसूरत लगता है जैसे उसके लिए सजना, संवरना, एक-दूजे को देखना, आंखों में बातें करना, उसे सराहना, उसकी हंसी पर अपने सुख, अपना अहम को निछावर कर देना। तब ये सब वास्तव में असल नहीं होता। वह एक अस्थायी रूप होता है, अभिनय होता है। अपने व्यक्तित्व के सबसे अच्छे पक्ष का बेहतरीन प्रस्तुतिकरण । पर जब विवाह हो जाता है, तो स्थायी रूप से यह अभिनय करना बेहद कठिन हो जाता है। सब अपने मूल स्वभाव गुस्सा, अहम, आत्मकेंद्रित फैसले पर लौट जाते हैं। तब रिश्ता टूट जाता है क्योंकि आप ‘बदल’ गए। आपसे रिश्ता ही उस किरदार को सच मानकर बनाया गया था, जो अभिनय था। प्रेम विवाह अधिकतर इसलिए असफल होते हैं।
पर जो प्रेम विवाह सफल हुए, ऐसे जोड़े, अपने बेस्ट प्रस्तुतिकरण को अपनी आदत में ढाल लेते हैं। केयर, डेडिकेशन, मुस्कुराहट और सह लेना ये सब स्वभाव स्थायी हो जाते हैं, आदत में ढल जाते है । प्रेम इस तरह इंसान की अच्छाइयों को स्थायित्व देता है। प्रेम जब आदत बन जाता है तो वो आपके व्यक्तित्व, स्वभाव और सांसों में बहता है। प्रेम आपके साथ चलता है, हाथों में हाथ लिए या आपके आगे-पीछे।
भारत के आदिवासी समाजों में प्रेम और विवाह को लेकर ऐसी ही परंपराएं रही हैं, जहां प्रेम केवल अनुभूति नहीं, जीवन-पद्धति है। झारखंड के संथाल आदिवासी समाज में ‘ग़ोनोंग’ परंपरा सदियों पुरानी है। संथाली भाषा में ‘ग़ोनोंग’ का अर्थ है—प्रेम-विवाह। इस परंपरा में युवक-युवती अपने जीवनसाथी स्वयं चुनते हैं। गांव के आखरा (चौपाल) में वे एक-दूसरे को देखते हैं, गीत गाते हैं, पहचान बनाते हैं। पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संथाल समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो परिवारों और पूरे गांव का होता है। चुनाव व्यक्तिगत है, पर निभाना सामूहिक। तभी तो संथाल समाज में प्रेम-विवाह के बाद भी तलाक की दर बहुत कम है। कारण यह है कि यहां विवाह को निभाने की जिम्मेदारी सिर्फ पति-पत्नी की नहीं, पूरे समाज की होती है। यही है प्रेम को आदत बनाने की ताकत। ओडिशा के गोण्ड आदिवासियों की ‘परधानिन’ परंपरा भी अनूठी है। यहां महिलाएं पीढ़ियों से प्रेम गीत-वृत्तांत लिखती और गाती आई हैं। प्रेम उनके लिए कोई एक दिन का उत्सव नहीं। वह उनकी सांसों में बसी एक आदत है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में प्रेम का जो स्वरूप चित्रित किया, वह आदत बन चुके प्रेम का ही । सुंदर कांड में हनुमान जी से मिलने पर श्रीराम कहते हैं प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
मरम न जानइ कोउ अधिकाई॥ अर्थात प्रेमरूपी भक्ति के जल के बिना, हे रघुनाथ, आपके मर्म को कोई नहीं जान सकता । तुलसीदास प्रेम को जल से जोड़ते हैं। जल बहता है, ठहरता नहीं। वह जीवन का आधार है, आदत है, आवश्यकता है।
जब प्रेम आदत बन जाता है, तो वह सिर्फ दो लोगों तक सीमित नहीं रहता। मित्र, पुत्र, परिवार, रिश्तेदार, टीम, वर्कप्लेस, देश-विदेश आपके दायरे में हर करीबी आपके प्रेम के झरने की कलकल में मदहोश होता है। उस झरने से दो अंजुल पानी पीकर तृप्त हो जाते हैं । जब वह आपसे मिलकर लौटते हैं , तो भीगी उंगलियों में आपकी खुशबू होती है। आपकी छाप,आपकी निशानी या कहिए, आपका विजिटिंग कार्ड। यदि उसे प्रेम की कद्र होती है, तो वह आपको भी उतना प्रेम लौटा कर जाएगा। इस लौटते प्रेम से आपकी भी दुनिया, आपका वातावरण, वर्कप्लेस, देश और भी खुशनुमा, और भी समृद्ध होता जाता है। आप आत्मविश्वासी और मजबूत होते हैं। दूसरों पर भरोसा करते हैं, टीम बनाते हैं, लीड करते हैं और लीड करने देते हैं। खूबसूरत दिखते, बोलते हैं और आपकी उदासी भी खूबसूरत लगती है। हां, कभी-कभार आ ही जाने वाले क्षणिक गुस्से में भी प्यार ही झलकता है ।
14 फरवरी का यह दिन वैलेंटाइन डे के नाम से जाना जाता है। बाजार में लाल गुलाब, चॉकलेट और ग्रीटिंग कार्ड्स होते हैं पर असली प्रेम इन बाजारू चीजों से नहीं बनता। असली प्रेम तो उस पति का है, जो हर सुबह अपनी पत्नी के लिए चाय बनाता है। उस पत्नी का है, जो बिना कहे पति की पसंद की सब्जी ले आती है। उस बेटे का है, जो बूढ़े पिता को डॉक्टर के पास ले जाता है। उस मित्र का है, जो मुसीबत में बिना बुलाए चला आता है। प्रेम गली अति सांकरी है, उसमें दो समा सकें, इसके लिए पहले अपने अहम को गली के बाहर छोड़ना पड़ता है और फिर हर रोज उस गली से गुजरना पड़ता है।
तो इस वैलेंटाइन डे पर प्रश्न सीधा है आप अपने संबंधों में प्रेम को केवल अभिनय के रूप में निभा रहे हैं, या उसे आदत में बदल रहे हैं? क्या आप वही हैं जो विवाह से पहले थे? क्या आपके गुस्से में भी प्यार झलकता है? प्रेम विवाह सफल होगा या असफल यह नियति पर निर्भर नहीं करता। यह दैनिक विकल्पों पर निर्भर करता है। जो जोड़े सफल होते हैं, वे अपने सबसे अच्छे पक्ष के बेहतरीन प्रस्तुतिकरण जैसे धैर्य रखने, मुस्कुराने और सह लेने को आदत में बदल लेते हैं। संथाल आदिवासी समाज ने सदियों पहले ही ये समझ लिया था कि प्रेम व्यक्तिगत चुनाव है, पर उसे निभाना सामूहिक जिम्मेदारी। तुलसीदास जी ने हजारों वर्ष पहले बता दिया था कि प्रेम नया नहीं, स्थायी होता है एक आदत होती है। तो आइए, इस वैलेंटाइन डे पर हम प्रेम को बाजार से नहीं, अपनी आदतों से सजाएं क्योंकि जब प्रेम आदत बन जाता है, तो वह सबूत नहीं मांगता वह स्वयं प्रमाण होता है।
(लेखक संकाय सदस्य है मानवविज्ञान विभाग,महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय)
प्रधान संपादक


