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September 4, 2026 7:02 pm

वर्धा जिले में दुर्लभ वनस्पति ‘रान लसन’ के अस्तित्व पर संकट

दूध बढ़ाने वाली औषधीय वनस्पति अब गिने-चुने जलस्थलों तक सीमित, संरक्षण के लिए विशेषज्ञों ने शुरू की खोज मुहिम

वर्धा, 4 सितंबर 2026। वर्धा जिले के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाने वाली दुर्लभ एवं उपयोगी वनस्पति रान लसन (Isoetes malabarica) अब धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही है। बरसात के दिनों में पहाड़ों पर पानी के छोटे-छोटे प्राकृतिक जलस्थलों में घास के बीच उगने वाली इस वनस्पति की मौजूदगी अब बेहद कम रह गई है। इसके संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से विशेषज्ञों की टीम ने जिले के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों में खोज एवं अध्ययन अभियान चलाया।

इस अभियान के तहत 30 अगस्त को विदर्भ के प्रसिद्ध वनस्पति वर्गीकरण विशेषज्ञ (Taxonomist) डॉ. रमेश आचार्य के नेतृत्व में कौशल मिश्र, बी.एस. मिरगे, नारायण देशमुख, बिपिन पांडे, नितिन अरबट, एडवोकेट ताम्रध्वज बोरकर सहित टीम ने वर्धा जिले के गिरड, मालेगांव और वानरकुंड क्षेत्रों का दौरा किया। टीम ने इन स्थानों पर बेहद कम संख्या में बची रान लसन वनस्पति के प्राकृतिक आवासों का निरीक्षण किया। इस दौरान मौसमी बदलाव, चराई तथा मानवीय गतिविधियों से वनस्पति को हो रहे नुकसान का भी अध्ययन किया गया।

डॉ. रमेश आचार्य ने कहा कि रान लसन एक महत्वपूर्ण और दुर्लभ वनस्पति है। इसके प्राकृतिक आवास लगातार कम हो रहे हैं, इसलिए इसके संरक्षण के लिए इसके प्राकृतिक स्रोतों की पहचान कर वैज्ञानिक तरीके से संवर्धन करना आवश्यक है।

डॉ. आचार्य ने रान लसन के औषधीय महत्व और इसकी जैविक विशेषताओं का विस्तृत एवं विवेचनात्मक अध्ययन किया। उनके मार्गदर्शन में वरिष्ठ वाइल्ड लाइफ वार्डन कौशल मिश्र ने इस वनस्पति के प्राकृतिक रूप से उगने वाले स्थानों की पहचान की।

कौशल मिश्र ने बताया कि करीब तीन दशक पहले ग्रामीण क्षेत्रों में रान लसन को गाय और भैंस का दूध बढ़ाने वाली उपयोगी वनस्पति के रूप में जाना जाता था। इसी कारण लोग इसे प्राकृतिक जलस्थलों से उखाड़कर बेचने लगे। अनियंत्रित दोहन के कारण इसकी संख्या में भारी कमी आई है। अब इसके बचे हुए प्राकृतिक आवासों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती है।

डॉ. रमेश आचार्य और कौशल मिश्र पिछले करीब 12 वर्षों से महात्मा गांधी आयुर्वेदिक महाविद्यालय, सालोड-हीरापुर के पोस्ट ग्रेजुएट एवं पीएचडी शोधार्थियों को रान लसन में होने वाले मौसमी परिवर्तनों और इसके अध्ययन से अवगत करा रहे हैं। इस अध्ययन से जानकी देवी बजाज विज्ञान महाविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थी भी लाभान्वित हुए हैं।

दूध बढ़ाने वाली वनस्पति के रूप में थी पहचान

कौशल मिश्र के अनुसार, आंजी बाजार, खरांगना बाजार और हेटी सहित आसपास के गांवों में कुछ लोग रान लसन की जानकारी रखते थे। करीब 30 वर्ष पहले इस वनस्पति को गाय और भैंस का दूध बढ़ाने वाली उपयोगी वनस्पति माना जाता था। इसकी इसी विशेषता के कारण लोग इसे प्राकृतिक जलस्थलों से उखाड़कर बेचने के लिए ले जाते थे।

विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े पैमाने पर इसके प्राकृतिक आवास से उखाड़े जाने और लगातार दोहन के कारण वर्धा जिले में रान लसन की संख्या में भारी कमी आई है। इसके अलावा चराई, मौसमी बदलाव और प्राकृतिक जलस्थलों में होने वाले परिवर्तन ने भी इसके अस्तित्व को प्रभावित किया है। स्थिति यह है कि अब यह वनस्पति जिले में बेहद सीमित स्थानों पर ही दिखाई देती है।

डॉ. खोबरागड़े ने कहा कि इस तरह की दुर्लभ वनस्पतियों को केवल पहचानना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण और वैज्ञानिक संवर्धन भी जरूरी है। रान लसन के संरक्षण के लिए स्थानीय लोगों की सहभागिता भी महत्वपूर्ण होगी।

विलुप्त हो रही वनस्पतियों के संरक्षण पर जोर

अभियान से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि रान लसन जैसी दुर्लभ वनस्पतियां केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनके औषधीय एवं पारिस्थितिक महत्व को भी समझने की जरूरत है। टीम द्वारा ऐसी ही कई विलुप्तप्राय वनस्पतियों की लगातार खोज, पहचान और संरक्षण पर कार्य किया जा रहा है।

इस अभियान में नागपुर के आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के डॉ. खोबरागड़े और अरबट भी शामिल रहे। टीम अब रान लसन के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने तथा इसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में आगे कार्य करने की तैयारी कर रही है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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