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September 1, 2026 9:33 pm

डिजिटल अरेस्ट में जेल नहीं, सिर्फ डर होता है… डीजीपी ने बताया कैसे साइबर ठग दिमाग पर करते हैं कब्जा

डिजिटल अरेस्ट में न कोई जेल, न पुलिस का पहरा… सिर्फ डर का मनोविज्ञान! डीजीपी अरुण देव गौतम ने खोला साइबर ठगी का सबसे बड़ा राज -डरिए नहीं, समझिए खेल”

CBN36 रायपुर। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी को लेकर छत्तीसगढ़ के डीजीपी अरुण देव गौतम ने बेहद महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना है कि डिजिटल अरेस्ट के पीछे सिर्फ तकनीक या ठगी का खेल नहीं, बल्कि बहुत गहरा मनोविज्ञान काम करता है। यही मनोविज्ञान पढ़कर साइबर अपराधी पढ़े-लिखे, जागरूक और यहां तक कि महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को भी अपने जाल में फंसा लेते हैं।

डीजीपी के मुताबिक, डिजिटल अरेस्ट के कई मामले सामने आ चुके हैं और इनमें महत्वपूर्ण व्यक्तियों से लेकर जागरूक और उच्च पदों पर कार्यरत लोग तक साइबर अपराधियों के शिकार हुए हैं। सवाल यह है कि आखिर इतने समझदार लोग भी इस जाल में कैसे फंस जाते हैं?

डीजीपी अरुणदेव गौतम के अनुसार इसका जवाब ‘डर’ है

साइबर अपराधी सबसे पहले व्यक्ति के मन में यह भय पैदा करते हैं कि वह किसी कानूनी मामले में फंस गया है। इसके साथ ही कई बार यह डर पैदा किया जाता है कि उसके परिवार का कोई सदस्य किसी गंभीर अपराध या कानूनी पचड़े में फंस सकता है। व्यक्ति इसी आशंका में मानसिक दबाव में आ जाता है और फिर साइबर अपराधी जो निर्देश देते हैं, वह उनका पालन करने लगता है।

यही वह बिंदु है जहां डिजिटल अरेस्ट का पूरा मनोवैज्ञानिक खेल शुरू होता है

डीजीपी अरुण देव गौतम का स्पष्ट कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद साइबर अपराधी इस तरह का माहौल बना देते हैं कि पीड़ित खुद को अपराधी समझने लगता है और दूसरी तरफ बैठे साइबर ठग के आदेशों का पालन करने लगता है।

कभी पीड़ित को कहा जाता है कि वह कमरे से बाहर न निकले, कभी वीडियो कॉल पर लगातार जुड़े रहने का दबाव बनाया जाता है और कभी पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी या परिवार को नुकसान का डर दिखाया जाता है। व्यक्ति को लगता है कि यदि उसने निर्देश नहीं माना तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई हो जाएगी।असल में कोई उसे गिरफ्तार नहीं कर रहा होता, लेकिन डर उसके व्यवहार को नियंत्रित कर रहा होता है

डीजीपी की बात का सबसे अहम संदेश यही है कि साइबर अपराधी तकनीक से ज्यादा मानसिक दबाव और भय का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए डिजिटल अरेस्ट से बचने की पहली कुंजी है—यह समझना कि फोन या वीडियो कॉल पर कोई पुलिस अधिकारी आपको घर में बैठकर गिरफ्तार नहीं कर सकता और न ही किसी को डिजिटल तरीके से ‘अरेस्ट’ किया जा सकता है।

डीजीपी का संदेश-डरिए नहीं, समझिए खेल

साइबर अपराधी जितना बड़ा पद, कानून और परिवार का डर दिखाते हैं, उतना ही व्यक्ति उनके जाल में फंसता चला जाता है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि घबराकर कोई वित्तीय लेन-देन न करें, अपनी बैंकिंग या व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें और तत्काल संबंधित पुलिस अथवा साइबर क्राइम तंत्र से संपर्क करें।

डिजिटल अरेस्ट कोई गिरफ्तारी नहीं-यह डर के जरिए किया जाने वाला साइबर फ्रॉड है

छत्तीसगढ़ पुलिस के ‘सायबर जागृति अभियान’ के बीच डीजीपी का यह संदेश खास महत्व रखता है, क्योंकि साइबर अपराधियों से मुकाबले में जागरूकता ही सबसे मजबूत हथियार है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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