संस्कृत दिवस पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में विशिष्ट व्याख्यान
CBN36 वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के संस्कृत साहित्य विभाग द्वारा संस्कृत दिवस के अवसर पर “संस्कृत वाङ्मय में पर्यावरणीय चेतना” विषय पर 28 अगस्त को महादेवी वर्मा सभागार में विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने ऑनलाइन माध्यम से व्याख्यान देते हुए कहा कि प्रकृति जीवनदायिनी शक्ति है। प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित करके ही मानव जीवन में समृद्धि और संतुलन प्राप्त किया जा सकता है।
प्रो. पाण्डेय ने कहा कि संस्कृत शास्त्रों में प्रकृति को माँ के रूप में परिभाषित किया गया है। भारतीय वाङ्मय में सृष्टि के प्रारम्भ में जल की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। पृथ्वी के प्रति वेदों की मातृभावना को व्यक्त करते हुए उन्होंने वेद वाक्य “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति से ही जीवन का आरम्भ होता है और मानव सहित समस्त जीव-जगत का अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण भारतीय संस्कृति में कोई नवीन विचार नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन जीवन-दृष्टि का अभिन्न अंग है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा को कंप्यूटर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त एवं वैज्ञानिक भाषाओं में माना जाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के वर्तमान युग में संस्कृत के अध्ययन, अनुसंधान और प्रयोग की अपार संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत की महिमा का गान हिंदी के महान कवि मैथिलीशरण गुप्त सहित अनेक विद्वानों एवं विचारकों ने किया है। वर्तमान समय में संस्कृत को नवीन प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान-विज्ञान से जोड़कर इसके व्यापक प्रसार को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। शोधार्थी साहेबुदेव शर्मा ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. अवधेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय-प्रवर्तन किया।
संस्कृत साहित्य विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रदीप ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत साहित्य विभाग के प्रभारी एवं सहायक प्रोफेसर डॉ. जगदीश नारायण तिवारी ने किया।
इस अवसर पर डॉ. रामानुज अस्थाना, डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव, डॉ. जयन्त उपाध्याय, डॉ. शैलेष मरजी कदम, डॉ. श्रीनिकेत मिश्र, डॉ. अखिलेश यादव, डॉ. अभिषेक सिंह, बी.एस. मिरगे सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान-परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के अंतर्संबंधों पर सार्थक विमर्श हुआ। उपस्थित विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने संस्कृत वाङ्मय में निहित पर्यावरणीय दृष्टि को वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक बताया।
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