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July 31, 2026 5:52 pm

कानाफूसी

काकरोच ने मचाया ऐसा तहलका

सीजेपी की धमक हम सभी ने जंतर-मंतर में देखा है, सरकार  की लाख कोशिशों के बाद भी देशभर से लाखों यूथ दिल्ली पहुंचे, जंतर-मंतर में नीट  पेपर लीक मामले में जमकर प्रोटेस्ट किया। प्रोटेस्ट भी ऐसा वैसा नहीं, सरकार को झुका कर ही माने। शिक्षा  मंत्री को कुर्सी छोड़नी पड़ गई। इसे कहते हैं प्रोटेस्ट। अपोजिशन की सियासत करने वाले अब सीजेपी में संभावनाएं तलाशने लगे हैं। यह संभावनाएं किसी और बात के लिए, इलेक्शन के मद्देनजर ही है। जेन जी ने जो कमाल किया है, उससे सत्ता क्या विपक्षी दिग्गज भी दहशत में है। अंदाज लगा रहे हैं, कल के रोज कुछ ऐसा-वैसा होता है तो जेन जी का रुख क्या रहेगा। बहरहाल जंतर-मंतर की धमक लीडरों में साफतौर पर दिखाई देने लगी है।

इंस्टाग्राम में 58 लाख फालोअर्स, ये तो कमाल हो गया

नीट पेपरलीक को जिस तरह जेन जी ने सीजेपी के बैनर तले प्रोटेस्ट किया उसके बाद एक और प्रोटेस्ट की शुरुआत हो गई है। वह है रिजर्वेशन को लेकर। इंस्टाग्राम पर 58 लाख के करीब फालोअर्स हो गए हैं, इनकी संख्या दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है। नीट पेपर लीक स्कैम से भी अगर रिजर्वेशन को लेकर प्रोटेस्ट शुरू हो गया तब क्या होगा। मंडल कमीशन तो याद है ना। देश की राजनीति के नब्ज को टटोलने वालों की बात करें तो, जेन जी जो ना करे कम ही है। रिजर्वेशन प्रोटेस्ट अगर बढ़ा तब क्या होगा। तब तो राम ही जाने और जेन जी । जेन जी की जेहन में क्या है ये तो वे ही जान और समझ सकते हैं। हम और आप तो बस आगे-आगे देख सकते हैं। वही करना होगा। 

शेर के मूंछ और गधे के पूंछ की बाल

बीते सप्ताह यह कहावत बहुत जोरदाल चली। बात कहां से  उठी और किसने यह बात उठाई, आप भी अच्छी तरह जानते और समझते हैं और हम भी। कहते हैं ना सियासत, मोहब्त और जंग में सबकुछ जायज होता है। अगर यह सही है तो, फिर सियासत करने वाले ये भी अच्छी तरह समझते हैं, कब किस मौके पर कौन सी बात कही जाए और किसे पब्लिक के बीच चलाई जाए।  बीेत दिनों की ही तो बात है, शहर बारिश के चलते तरबतर हो गया था। ऐसा कोई मोहल्ला नहीं बचा था जहां पानी का जमाव ना हुआ हो। विपक्षी दल के नेताओं ने आपदा में अवसर तलाश ली और कमर भर पानी में लोगों के हितैषी बनकर फोटो भी खींचा ली। दूसरे दिन सत्ताधारी दल के एमएलए पर आरोप भी मढ़ दिया। रिएक्शन फिर इसी अंदाज में सामने आया। शेर के मूंछ की बाल और गधे के पूंछ की बाल की तुलना के साथ। दोनों में अंतर निकालना आपका काम है।

बेचारे विधायक को नहीं मिल राहत

नियम कानून कायदे के साथ प्रदेश के एक विधायक ने पहले सुप्रीम कोर्ट और फिर हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका लगा दी। वह भी एक दो नहीं पूरे तीन। नियमों का हवाला दिया, विलंब से याचिकाकर्ताओं द्वारा याचिका दायर करने की बात कही, याचिका में गलतियों को जिस तरह सुधारने की छूट दी गई, उस पर भी सवाल उठा दिया। पर एक नहीं चल पाई। सोचे थे, इतनी गलतियों के बीच उनके खिलाफ दायर चुनाव याचिका खारिज हो ही जाएगी। र ऐसा नहीं हुआ। मंसूबे पर पानी फिर गया। तीनों पुनर्विचार आवेदन खारिज और सुनवाई की तिथि तय। 

अटकलबाजी

जरा पता करिए,वे कौन विधायक महोदय हैं जिनके खिलाफ इलेक्शन पिटिशन दायर है, पूरे प्रपंच के बाद सुनवाई को टाल नहीं पाए।

एक भैया ने कह दिया,वे मुंगेरी लाल के सपने पालते नहीं बैठे रहते, पार्टी ने बहुत कुछ  दिया है, वह काफी है। क्या रिटायरमेंट लेने की सोच रहे हैं या फिर दिल्ली ने इशारा कर दिया है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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