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May 27, 2026 6:34 pm

बारनवापारा के देवपुर जंगल में दिखी दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी: जैव विविधता संरक्षण को मिली बड़ी सफलता

रायपुर, 27 मई 2026।छत्तीसगढ़ के बारनवापारा वन क्षेत्र ने एक बार फिर अपनी समृद्ध जैव विविधता से प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। बलौदाबाजार वनमंडल के अंतर्गत देवपुर जंगल में हाल ही में आयोजित ‘देवपुर समर कैंप 2026’ के दौरान भारत की सबसे बड़ी गिलहरी प्रजातियों में से एक विशाल भारतीय गिलहरी जायंट मालाबार स्क्विरल देखी गई है। इस दुर्लभ वन्यजीव के दर्शन से वन विभाग के अधिकारियों, प्रकृति प्रेमियों और वैज्ञानिकों में भारी उत्साह है।

वन मंत्री ने दी बधाई

प्रदेश के वन मंत्री केदार कश्यप ने इस उपलब्धि पर वन विभाग की टीम को हार्दिक बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों का सकारात्मक परिणाम है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि सरकार जंगलों को सुरक्षित बनाने और दुर्लभ प्रजातियों के लिए अनुकूल आवास विकसित करने हेतु प्रतिबद्ध है।

कैंप के दौरान हुई पहचान

बलौदाबाजार वनमंडल द्वारा 16 मई से 22 मई 2026 तक देवपुर समर कैंप का आयोजन किया गया था। कैंप के उद्घाटन दिवस यानी 16 मई को आयोजित ‘बर्डिंग ट्रेल’ के दौरान प्रकृति प्रेमी एवं साइबर रिस्क एक्सपर्ट हेमंत वर्मा ने इस दुर्लभ गिलहरी को देखा और इसकी पहचान की।

विशाल भारतीय गिलहरी की विशेषताएं

वैज्ञानिक भाषा में  रेटूफा इंडिका के नाम से जानी जाने वाली यह गिलहरी भारत की सबसे बड़ी वृक्षवासी गिलहरियों में से एक है। इसकी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है पूंछ सहित इसकी लंबाई लगभग तीन फीट तक हो सकती है।इनके शरीर पर गहरे लाल, भूरे, काले और क्रीम रंगों का आकर्षक मिश्रण होता है।यह अपना अधिकांश जीवन पेड़ों पर ही व्यतीत करती है और एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लंबी छलांग लगाने में माहिर होती है।

पारिस्थितिकी तंत्र के लिए शुभ संकेत

वनमंडलाधिकारी धम्मशील गणवीर ने बताया कि यह प्रजाति वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-2 के अंतर्गत संरक्षित है। उन्होंने कहा कि बारनवापारा और आसपास के जंगलों में इस गिलहरी का दिखना वहां के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमाण है।

इस समर कैंप का मुख्य उद्देश्य भी यही था कि नई पीढ़ी में प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई जाए। कैंप में शामिल हुए बच्चों और युवाओं के लिए यह अनुभव अत्यंत प्रेरणादायक रहा, जो भविष्य में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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