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October 10, 2026 12:27 pm

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता रियाजुल बारी के खिलाफ आरोप पत्र निरस्त, हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई भी की रद्द

पेंशन नियमों के तहत राज्यपाल की मंजूरी का मामला उठा, सेवानिवृत्ति के करीब तीन साल बाद जारी हुआ था आरोप पत्र

CBN36 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता रियाजुल बारी को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी आरोप पत्र और उसके आधार पर शुरू की गई विभागीय कार्यवाही निरस्त कर दी है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के नियम 9 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की एकल पीठ में हुई।

मामले के अनुसार, रियाजुल बारी छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में मुख्य अभियंता के पद पर कार्यरत थे। वे 30 जून 2023 को सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अवर सचिव ने 21 अप्रैल 2026 को उनके खिलाफ आरोप पत्र जारी किया। इसमें छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के तहत विभागीय कार्यवाही की प्रक्रिया अपनाई गई थी।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में अनियमित भुगतान के आरोप

आरोप पत्र में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत अतिरिक्त निष्पादन सुरक्षा निधि (APS), सुरक्षा निधि (SD), निष्पादन गारंटी (PG), छह प्रतिशत रॉयल्टी और जीएसटी की राशि के कथित दुरुपयोग तथा अनियमित भुगतान के आरोप लगाए गए थे। विभाग का आरोप था कि शासकीय एवं पदीय दायित्वों का नियमानुसार निर्वहन नहीं किया गया। इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के विपरीत बताया गया था।

सेवानिवृत्ति से पहले मिला था अनापत्ति प्रमाण पत्र

आरोप पत्र और विभागीय कार्यवाही को चुनौती देते हुए रियाजुल बारी ने हाईकोर्ट के अधिवक्ता शिबाशीष मिश्रा के माध्यम से याचिका दायर की। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक ने पक्ष रखा।

याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि रियाजुल बारी ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में चार दशक से अधिक समय तक सेवा दी। सेवानिवृत्ति से पहले विभाग ने उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी किया था। इसमें प्रमाणित किया गया था कि उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच या प्रतिकूल मामला लंबित नहीं है।

अधिवक्ताओं ने दलील दी कि रियाजुल बारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही सामान्य सेवा नियमों के बजाय पेंशन नियम, 1976 के प्रावधानों के अनुसार ही शुरू की जा सकती है।

राज्यपाल की मंजूरी के बिना कार्रवाई पर उठाए सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि पेंशन नियम, 1976 के नियम 9(2)(b)(i) के तहत निर्धारित परिस्थितियों में सेवानिवृत्त कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए राज्यपाल की मंजूरी आवश्यक है। इस मामले में संबंधित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

अधिवक्ताओं ने कहा कि केवल मुख्यमंत्री की मंजूरी के आधार पर कार्रवाई शुरू करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि संबंधित पेंशन नियम में राज्यपाल की मंजूरी का प्रावधान है। शासन की ओर से ऐसा कोई संशोधन भी प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जिससे यह साबित हो कि नियम में राज्यपाल के स्थान पर मुख्यमंत्री की मंजूरी का प्रावधान कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के मीरा साहनी बनाम दिल्ली मामले के साथ हाईकोर्ट की रिट अपील क्रमांक 266/2025 में डिवीजन बेंच के फैसले और रिट याचिका क्रमांक 3981/2004 में पारित आदेश का हवाला दिया गया।

अधिवक्ताओं का तर्क था कि पेंशन नियमों में निर्धारित अनिवार्य शर्तों का पालन किए बिना सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कानूनी प्रावधान में संशोधन किए बिना किसी कार्यकारी निर्देश या सर्कुलर के आधार पर नियमों में निर्धारित प्रक्रिया को बदला नहीं जा सकता। राज्यपाल की मंजूरी की अनिवार्यता को केवल प्रशासनिक निर्देश या मुख्यमंत्री की मंजूरी के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर आरोप पत्र किया निरस्त

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने रियाजुल बारी के खिलाफ 21 अप्रैल 2026 को जारी आरोप पत्र और उसके आधार पर शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली।

इस फैसले से रियाजुल बारी को विभागीय कार्यवाही के मामले में राहत मिली है। हालांकि, आरोप पत्र निरस्त किए जाने को वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों पर गुण-दोष के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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