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October 7, 2026 6:33 pm

बैंकॉक में गूंजा भारतीय रंगमंच का स्वर, ‘दूत वाक्यम्’ ने बटोरी तालियां

ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस में हिंदी विश्वविद्यालय की डॉ. विधु खरे दास ने प्रस्तुत किया शोध पत्र

CBN36 वर्धा, 7 अक्टूबर। भारतीय संस्कृति, संस्कृत साहित्य और रंगमंच की समृद्ध परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हुए थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में ‘दूत वाक्यम्’ नाटक का सफल मंचन किया गया। सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी में कोलाज कल्चरल सोसाइटी की ओर से आयोजित ‘ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस-2026’ में हुई इस प्रस्तुति को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों ने खूब सराहा।

महाकवि भास की प्रसिद्ध रचना ‘दूत वाक्यम्’ को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कृति ‘रश्मिरथी’ के कथ्य से जोड़ते हुए मंचित किया गया। प्रस्तुति में भारतीय शास्त्रीय साहित्य, संस्कृत रंगपरंपरा और आधुनिक रंगमंचीय अभिव्यक्ति का प्रभावी समन्वय देखने को मिला।

डॉ. विधु खरे दास और अनिमेष खरे दास ने किया निर्देशन

नाटक की परिकल्पना एवं निर्देशन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रदर्शनकारी कला विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. विधु खरे दास और अनिमेष खरे दास ने संयुक्त रूप से किया। दोनों ने नाटक की मूल संवेदना और साहित्यिक कथ्य को मंचीय भाषा में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

मंचन में शारदा यूनिवर्सिटी, ग्रेटर नोएडा के डॉ. राघवेंद्र मिश्रा ने सहायक निर्देशक की भूमिका निभाई। वहीं, एकल कलाकार पंकज कुमार पांडे ने अपने प्रभावी अभिनय से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। सीमित मंचीय संसाधनों के बीच एकल अभिनय के माध्यम से कथा और पात्रों की भावनाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।

सम्मेलन में शोध पत्र भी किया प्रस्तुत

ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस में डॉ. विधु खरे दास ने नाटक के मंचन के साथ अपना शोध पत्र भी प्रस्तुत किया। उनके शोध पत्र को सम्मेलन में मौजूद विद्वानों और शोधार्थियों ने सराहा। सम्मेलन में देश-विदेश से आए संस्कृत एवं भारतीय साहित्य के अध्येताओं के बीच शोध पत्र की प्रस्तुति ने भारतीय रंगमंच और प्रदर्शनकारी कलाओं से जुड़े अकादमिक विमर्श को भी नई दिशा दी।

भारतीय संस्कृति की वैश्विक मंच पर प्रभावी प्रस्तुति

‘दूत वाक्यम्’ का मंचन केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं रहा, बल्कि इसके माध्यम से भारतीय साहित्य, संस्कृत नाट्य परंपरा और रंगमंचीय संस्कृति की वैश्विक स्तर पर प्रभावी उपस्थिति दर्ज हुई। बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने भारतीय कथ्य और रंगभाषा के इस संयोजन को सराहना मिली।

ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस-2026 में हुई यह प्रस्तुति भारतीय रंगमंच की उस परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखी जा रही है, जिसमें शास्त्रीय साहित्य को समकालीन मंचीय अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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