वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता पर राजेश मडावी का शोधपरक ग्रंथ, 1886 से 1986 तक के इतिहास का दस्तावेजी अवलोकन
CBN36 वर्धा। महात्मा गांधी के आगमन के बाद वर्धा-सेवाग्राम की धरती भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गई थी। करीब डेढ़ दशक तक स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण गतिविधियों का संचालन यहां से हुआ। ऐसे में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ चल रहे आंदोलन और सामाजिक बदलावों से वर्धा की पत्रकारिता भी अछूती नहीं रही। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सामने लाने का प्रयास राजेश मडावी ने अपनी पुस्तक ‘शताब्दी की साक्ष : वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता’ में किया है।
पुस्तक में वर्ष 1886 से 1986 तक वर्धा जिले से प्रकाशित समाचारपत्रों, साप्ताहिकों, मासिकों, त्रैमासिकों और अन्य नियतकालिकों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता को मिशन के रूप में आगे बढ़ाने वाले पत्रकारों और संपादकों के योगदान को दस्तावेजी रूप में दर्ज किया गया है।
वरिष्ठ पत्रकार, समीक्षक और साहित्य, कला एवं सांस्कृतिक इतिहास शोधकर्ता डॉ. राजेंद्र मुंढे ने पुस्तक की भूमिका में कहा है कि वर्धा जिले के ध्येयनिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान अब तक अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा है। मडावी ने ऐतिहासिक संदर्भ सामग्री, पुराने समाचारपत्रों और नियतकालिकों, दुर्लभ दस्तावेजों तथा वरिष्ठ लोगों के साक्षात्कारों के आधार पर इस इतिहास को सामने लाने का प्रयास किया है।
गांधी युग से पहले ही शुरू हो गई थी पत्रकारिता
वर्धा का पहला साप्ताहिक समाचारपत्र ‘वर्धा लहरी’ वर्ष 1886 में नारायणराव थोरात ने शुरू किया था। इसी वर्ष केशवराव जोरवेकर ने कानून विषयक मासिक ‘न्यायदर्पण’ शुरू किया। इसके बाद हरदास सदाशिव पटवर्धन ने 1890 में ‘न्यायसुधा’ मासिक प्रकाशित किया। इससे वर्धा की प्रारंभिक पत्रकारिता में वैचारिक और कानून संबंधी विषयों की प्रमुखता का पता चलता है।
जिनदास चवडे ने 1897 में ‘जैन भास्कर’ नामक हिंदी पत्रिका और 1908 में ‘जैन बंधू’ नामक मराठी समाचारपत्र शुरू किया। मडावी के अनुसार, वर्धा में मुद्रण व्यवसाय की नींव रखने वालों में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
तिलक, सत्यशोधक और आंबेडकरी पत्रकारिता का प्रभाव
पुस्तक में वर्धा की पत्रकारिता को विभिन्न कालखंडों में समझने का प्रयास किया गया है। इनमें तिलक पत्रकारिता, सत्यशोधक पत्रकारिता, आंबेडकरी पत्रकारिता और गांधी युग की पत्रकारिता प्रमुख हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता केवल समाचार देने तक सीमित नहीं थी, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के विश्लेषण तथा जनजागरण का माध्यम भी बनी।
वर्धा के उद्योगपति और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े जमनालाल बजाज द्वारा 1907 में नागपुर से प्रकाशित ‘हिंदी केसरी’ को आर्थिक सहयोग देने का उल्लेख भी पुस्तक में किया गया है। वहीं सत्यशोधक आंदोलन से जुड़े तुकारामजी वसू द्वारा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के ‘बहिष्कृत भारत’ को आर्थिक सहायता दिए जाने की जानकारी भी सामने आती है।
मडावी के शोध के अनुसार वर्धा में ‘मूकनायक’ और ‘जनता’ जैसे पाक्षिकों की सदस्यता के लिए भी कार्यक्रमों में प्रस्ताव पारित किए गए थे। ये घटनाएं उस दौर की सामाजिक और वैचारिक सक्रियता को दर्शाती हैं।
‘महाराष्ट्र धर्म’ से गांधी-विचार की पत्रकारिता को मिली दिशा
वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता में गांधी विचार का प्रभाव भी पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आचार्य विनोबा भावे ने सर्वोदय विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए 1923 में ‘महाराष्ट्र धर्म’ नामक मासिक शुरू किया था। इस दौर की पत्रकारिता में पत्रकारिता को पेशे के बजाय मिशन के रूप में देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
डॉ. मुंढे के अनुसार, वर्धा में वस्तुनिष्ठ समाचारों के साथ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं के पीछे की धाराओं और उनके संभावित परिणामों को समझाने वाली जनहितैषी पत्रकारिता की परंपरा विकसित हुई। इसे ‘अन्वयार्थक पत्रकारिता’ (Interpretative Journalism) के रूप में देखा जा सकता है।
महात्मा फुले के चरित्र से लेकर दुर्लक्षित दस्तावेजों तक
पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि सत्यशोधक पंढरीनाथ सीताराम पाटील द्वारा लिखित महात्मा ज्योतिबा फुले का चरित्र वर्ष 1928 में वर्धा से प्रकाशित हुआ था। प्राचीन जैन साहित्य के प्रकाशन और उसके विवेचन से लेकर सामाजिक आंदोलनों से जुड़े नियतकालिकों तक, मडावी ने पत्रकारिता के साथ जुड़े विभिन्न पहलुओं को एक जगह लाने का प्रयास किया है।
डॉ. मुंढे के मुताबिक, मडावी ने व्यक्ति या संस्था के प्रति भक्तिभाव से अलग रहते हुए वस्तुनिष्ठता और विवेक के साथ इतिहास को देखने का प्रयास किया है। इतिहास लेखन को निरंतर चलने वाली ज्ञान-प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा कि नए प्रमाण सामने आने पर पुराने निष्कर्षों में बदलाव की गुंजाइश बनी रहती है।
1980 के दशक के बाद बदली पत्रकारिता की तस्वीर
ग्रंथ में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर भी ध्यान दिया गया है। 1980 के दशक से सूचना, तकनीक और मुद्रण तकनीक में आए बदलावों ने समाचारपत्रों की कार्यप्रणाली को प्रभावित किया। कंप्यूटर के आगमन के बाद समाचारपत्रों के निर्माण और प्रकाशन की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव आया। बाद के दौर में वैश्वीकरण और खुली अर्थव्यवस्था के प्रभाव से मीडिया के स्वरूप और पाठक वर्ग में भी परिवर्तन आया।
इतिहास के साथ वर्तमान पत्रकारिता पर भी सवाल
ग्रंथ के परिशिष्ट में नौ संपादकों के गद्य-निबंध शामिल किए गए हैं। इसके अलावा ‘पत्रकारिता : कल, आज और कल’ विषय पर वरिष्ठ संपादक सुरेश द्वादशीवार का साक्षात्कार भी पुस्तक में शामिल है। इससे तत्कालीन पत्रकारिता के साथ वर्तमान मीडिया परिदृश्य को समझने का आधार मिलता है।
डॉ. मुंढे ने पुस्तक की एक सीमा के रूप में यह भी उल्लेख किया है कि इसमें किसी एक समाचारपत्र का सर्वांगीण विश्लेषण करने के बजाय पाठकों तक ऐतिहासिक जानकारी पहुंचाने पर अधिक जोर दिया गया है। इसके बावजूद उनका मानना है कि वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता पर उपलब्ध सीमित ग्रंथ-संपदा के बीच यह प्रयास महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि ‘शताब्दी की साक्ष : वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता’ केवल एक जिले की पत्रकारिता का इतिहास नहीं, बल्कि मूल्यनिष्ठ और जनोन्मुख पत्रकारिता की परंपरा का दस्तावेज भी है। पुरानी पीढ़ी के ध्येयनिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का परिचय कराने वाला यह ग्रंथ वर्तमान पत्रकारिता में लोकजीवन के प्रति प्रतिबद्धता को समझने का आधार प्रदान करता है।डॉ. राजेंद्र मुंढे ने राजेश मडावी के भविष्य के शोधपरक और सृजनात्मक लेखन के लिए शुभकामनाएं दी हैं।
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