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August 20, 2026 7:04 pm

शिशु संरक्षण माह: स्वस्थ बचपन और सुरक्षित भविष्य की मजबूत नींव

(धनंजय राठौर,संयुक्त संचालक, जनसंपर्क)

CBN36 छत्तीसगढ़ ।शिशु जीवन का सबसे नाजुक दौर होता है। इस उम्र में मिलने वाला सही पोषण, समय पर टीकाकरण और बेहतर स्वास्थ्य देखभाल बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की मजबूत नींव तैयार करते हैं। इसी उद्देश्य से 0 से 5 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण, एनीमिया और विभिन्न संक्रामक बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य एवं महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से ‘शिशु संरक्षण माह’ का आयोजन किया जाता है। यह अभियान नवजात और छोटे बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के साथ-साथ उनके बेहतर भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

छत्तीसगढ़ में शिशु संरक्षण माह का नया चरण 18 अगस्त 2026 से शुरू हो गया है। अभियान के तहत 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

बाल मृत्यु दर में कमी लाना प्रमुख लक्ष्य

शिशु संरक्षण माह का प्रमुख उद्देश्य बाल मृत्यु दर, विशेषकर पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को कम करना है। इसके साथ ही बच्चों में बीमारियों की समय पर पहचान, आवश्यक विटामिन और खनिज की उपलब्धता तथा माताओं और परिवारों को पोषण, स्तनपान और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना भी अभियान के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।

गांव-गांव पहुंच रहीं स्वास्थ्य सेवाएं

शिशु संरक्षण माह के दौरान स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को विभिन्न स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इनमें प्रमुख रूप से—

विटामिन-ए की खुराक: 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को विटामिन-ए की खुराक दी जाती है। इससे रतौंधी जैसी आंखों से जुड़ी समस्याओं की रोकथाम के साथ बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है।

एनीमिया से बचाव: 6 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को खून की कमी यानी एनीमिया से बचाने के लिए आयरन एवं फॉलिक एसिड (आईएफए) सिरप उपलब्ध कराया जाता है।

छूटे टीकों का पूरा कराया जाना: नियमित टीकाकरण से वंचित रह गए बच्चों को आवश्यक टीके लगाए जाते हैं, ताकि उन्हें खसरा, रूबेला, पोलियो, काली खांसी और टिटनेस जैसी गंभीर बीमारियों से सुरक्षा मिल सके।

कुपोषण की पहचान और उपचार: आंगनबाड़ी स्तर पर बच्चों का वजन और लंबाई मापकर उनकी पोषण स्थिति का आकलन किया जाता है। गंभीर और मध्यम कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर आवश्यकतानुसार उपचार एवं पोषण सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को जरूरत पड़ने पर पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा जाता है।

दस्त नियंत्रण और ओआरएस का वितरण: बच्चों में दस्त के दौरान डिहाइड्रेशन यानी शरीर में पानी की कमी को रोकने के लिए माताओं को ओआरएस के पैकेट और जिंक की गोलियां उपलब्ध कराई जाती हैं।

दवा के साथ व्यवहार परिवर्तन पर भी जोर

शिशु संरक्षण माह केवल दवाएं और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। अभियान के दौरान माताओं और परिवारों को बच्चों के पोषण, विकास, स्वच्छता और देखभाल के संबंध में जरूरी परामर्श भी दिया जाता है। बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए परिवार के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान

माताओं को बताया जाता है कि जन्म के तुरंत बाद, यानी संभव हो तो एक घंटे के भीतर, बच्चे को मां का पहला गाढ़ा पीला दूध यानी कोलोस्ट्रम जरूर पिलाएं। यह बच्चे के लिए बेहद महत्वपूर्ण पोषण और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। शुरुआती छह माह तक बच्चे को केवल स्तनपान कराने के लिए भी माताओं को प्रेरित किया जाता है।

छह माह बाद पूरक आहार जरूरी

बच्चे के छह माह की आयु पूरी होने के बाद स्तनपान के साथ पर्याप्त मात्रा और गुणवत्ता वाला पूरक आहार शुरू करना चाहिए। छह से 12 माह की उम्र में बच्चा धीरे-धीरे पौष्टिक ठोस आहार लेना शुरू करता है। इस दौरान मां का दूध उसके पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत बना रहता है।

बच्चे को नए स्वाद और अलग-अलग प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे और धैर्यपूर्वक खिलाने चाहिए। जब बच्चा ठोस आहार लेना शुरू करे तो भोजन को उसकी उम्र के अनुरूप छोटे, सुरक्षित टुकड़ों या उचित बनावट में तैयार कर देना चाहिए, ताकि उसके गले में भोजन अटकने का खतरा कम हो। बच्चे को जबरदस्ती खिलाने से बचना चाहिए।

बातचीत, खेल और नींद भी उतनी ही जरूरी

बच्चे के मस्तिष्क के विकास में परिवार की सक्रिय भूमिका होती है। माता-पिता और परिवार के सदस्यों को शिशु से बातें करने, उसे पढ़कर सुनाने और उसके लिए गाने की सलाह दी जाती है। इससे बच्चे के सीखने, समझने और संवाद कौशल के विकास में मदद मिलती है।

शिशु के बेहतर विकास के लिए पर्याप्त नींद भी जरूरी है। 4 से 12 माह के शिशुओं के लिए 24 घंटे में झपकी सहित प्रतिदिन 12 से 16 घंटे की नींद की अनुशंसा की जाती है। परिवार को बच्चे के लिए सोने का सुरक्षित और पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।

सक्रिय रखना भी विकास का हिस्सा

शिशु को सक्रिय रखना उसके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। दिनभर उसकी उम्र और क्षमता के अनुसार हाथ-पैर चलाने और सुरक्षित शारीरिक गतिविधियों के अवसर देने चाहिए। जमीन पर सुरक्षित तरीके से समय बिताने, हिलने-डुलने और आसपास की चीजों को समझने का अवसर मिलने से बच्चे के शारीरिक विकास के साथ उसकी सीखने की क्षमता भी विकसित होती है।

शिशु को लंबे समय तक झूले, स्ट्रोलर, बाउंसिंग सीट, एक्सरसाइज सॉसर या अन्य किसी बांधकर रखने वाले उपकरण में नहीं रखना चाहिए। उसे सुरक्षित वातावरण में बाहर निकालकर उम्र के अनुरूप स्वतंत्र रूप से हिलने-डुलने और खेलने का अवसर देना चाहिए।

स्वच्छता से संक्रमण पर लगाम

बच्चे को स्वस्थ रखने में स्वच्छता की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अभियान के दौरान माताओं और परिवारों को सही तरीके से हाथ धोने, बच्चे की साफ-सफाई रखने और आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखने के बारे में जागरूक किया जाता है। साफ-सफाई की अच्छी आदतें बच्चों को संक्रमण से बचाने में मदद करती हैं।

सामूहिक प्रयास से बनेगी स्वस्थ पीढ़ी

शिशु संरक्षण माह केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि हर परिवार और पूरे समाज को बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने का अवसर भी है। बच्चों को स्वस्थ और कुपोषण से मुक्त रखने के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, मितानिन/आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

जब परिवार और समाज के सभी वर्ग मिलकर बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य, टीकाकरण, स्वच्छता और समुचित देखभाल पर ध्यान देंगे, तभी स्वस्थ, कुपोषण-मुक्त और सशक्त पीढ़ी का निर्माण संभव होगा। शिशु का स्वस्थ बचपन ही सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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