वैवाहिक स्थिति के आधार पर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता, राज्य सरकार का आदेश निरस्त
CBN36 बिलासपुर। अनुकंपा नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी अविवाहित शासकीय कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसकी शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की पात्र हो सकती है। संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि केवल महिला के विवाहित होने के आधार पर उसे अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
मामला बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी दुर्गेश मिश्रा से जुड़ा है, जो जांजगीर-चांपा में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। अविवाहित होने के कारण उनकी वृद्ध मां तारा मिश्रा ने राज्य शासन की अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत अपनी बेटी एवं मृतक की बहन अमिता दुबे के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन प्रस्तुत किया।
हालांकि, गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग ने 19 सितंबर 2019 को यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि नीति में विवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
इसके खिलाफ परिवार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में तर्क दिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों के अनुसार केवल विवाह हो जाने से किसी बेटी या बहन का अपने मूल परिवार से संबंध समाप्त नहीं हो जाता। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि विवाहित भाई को पात्रता से बाहर नहीं किया जाता, तो केवल विवाहित होने के आधार पर बहन को वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन है।
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर चार सप्ताह के भीतर नियमों के अनुरूप पुनर्विचार करते हुए नया और उचित निर्णय लिया जाए।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महज वैवाहिक स्थिति और लैंगिक पूर्वाग्रह के आधार पर किसी महिला को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
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