CBN36 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्ति के बाद आरोपपत्र जारी करने से पहले राज्यपाल की स्वीकृति अनिवार्य है। इस प्रक्रिया का पालन किए बिना जारी आरोपपत्र वैधानिक रूप से टिक नहीं सकता।
जस्टिस बीडी गुरु की एकलपीठ ने नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अवर सचिव द्वारा 6 जुलाई 2026 को जारी आरोपपत्र को निरस्त कर दिया। अदालत ने माना कि विभाग ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 9(2)(ख) का पालन नहीं किया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने दलील दी कि कर्मचारी 30 जून 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके थे। इसके बाद विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए नियमों के तहत राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी, लेकिन बिना मंजूरी के आरोपपत्र जारी कर दिया गया, जो अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानून के विपरीत है।
वहीं, राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारी ने कहा कि विभागीय कार्रवाई सेवाकाल के दौरान हुई कथित अनियमितताओं के संबंध में शुरू की गई है। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि कर्मचारी 30 जून 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके थे।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के एक वर्ष बाद 6 जुलाई 2026 को आरोपपत्र जारी किया गया। चूंकि कार्रवाई से पहले राज्यपाल की स्वीकृति नहीं ली गई, इसलिए विभागीय कार्रवाई की शुरुआत ही नियमों के अनुरूप नहीं थी।
अदालत ने विवादित आरोपपत्र को निरस्त करते हुए राज्य शासन को यह स्वतंत्रता दी कि यदि आवश्यक हो तो छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 9(2)(ख) की सभी अनिवार्य शर्तों का पालन कर विधि सम्मत तरीके से नई विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
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